मोतिहारी.इस्लाम के पांच अहम स्तंभों में एक जकात भी शामिल है. इसके लिए हुक्म है सालभर में एक बार व्यक्ति अपने माल-जर, संपत्ति, कारोबार, नेट बचत से एक निश्चित राशि निकाले और वास्तविक जरूरतमंदों की मदद करे. सरकारों द्वारा वसूल किया जाने वाला टैक्स की ही एक शक्ल जकात है, जिसकी अदायगी बिना किसी नोटिस,रिमाइंडर व तगादे के करना होती है. बड़ी बात यह भी है कि अदा की जाने वाली इस राशि का असेसमेंट भी खुद लोगों को ही करना होती है. कोई भी जकात अदाकर्ता इस कैलकुलेशन में न तो कोई हेर फेर करता है और न ही इससे बचने की गलियां खोजता है. प्रसिद्ध उलेमा व जामा मस्जिद के मौजूदा इमाम व प्रसिद्ध इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती मो.साजिद काशमी ने बताया कि धन की शुद्धीकरण के लिए जकात यानी दान जरूरी है. जकात नहीं देने वालों पर अल्लाह नाराज होता है और कयामत के दिन सजा देता है. किन पर जकात फर्ज है और किनके लिए मुफ्ती मो. काशमी के अनुसार, एक ऐसा संपन्न व्यक्ति, जो मानसिक रूप से स्वस्थ्य है और जिस पर कोई कर्ज नहीं है, वह जकात दे सकता है. उसे अपनी संपत्ति का कुल ढाई प्रतिशत सालाना जकात के रूप में अदा किए जाने का हुक्म है. गरीब, जरूरतमंद, आर्थिक रूप से कमजोर, विधवा या बे सहारा व्यक्ति को ये राशि अदा की जा सकती है. दी जाने वाली राशि अधिक हो तो यह एक से अधिक लोगों में भी बांटी जा सकती है. जकात अदा करने के लिए ये भी कहा गया है कि इसके लिए बेहतर जरूरतमंद और जकात लेने के हकदार व्यक्ति की अच्छे से खोज करके अदा की जाए, ताकि इसको अदा करने का मकसद पूरा हो सके. हुक्म यह भी है कि जकात देते समय पहली नजर अपने करीबी रिश्तेदारों, मुहल्लेदार और आसपास के कमजोर लोगों को देखा जाए, ताकि उनकी आसान मदद की जा सके.
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