Motihari News: कभी नील की खेती के लिए पहचाना जाने वाला चंपारण अब ‘मखाने’ की मिठास से अपनी नई पहचान लिख रहा है. केंद्र सरकार द्वारा मखाने को जीआई टैग मिलने के बाद पूर्वी चंपारण के किसानों ने इस पारंपरिक खेती को स्वरोजगार का मुख्य जरिया बना लिया है. बंजरिया प्रखंड की धनौती नदी के तटीय इलाकों में अब मखाने की लहलहाती फसल किसानों की किस्मत बदल रही है.
दशक भर का संघर्ष और ललन सहनी की पहल
बिहार राज्य मछुआरा आयोग के अध्यक्ष और प्रगतिशील किसान ललन कुमार सहनी इस खेती को पुनर्जीवित करने के लिए पिछले 10 वर्षों से डटे हुए हैं. धनौती नदी क्षेत्र में करीब 20 से 25 एकड़ में मखाना उत्पादन शुरू कर उन्होंने एक मिसाल पेश की है. ललन सहनी बताते हैं कि उनके पिता स्व. दरोगा चौधरी भी इसी खेती से जुड़े थे, और अब वह इस विरासत को ‘ब्लू इकॉनमी’ का आधार बना रहे हैं. जलकुंभी और पानी की किल्लत जैसी चुनौतियों के बावजूद यहाँ उत्तम क्वालिटी का मखाना तैयार हो रहा है.
रुका पलायन, मजदूरों को मिला घर में काम
मखाना खेती का सबसे बड़ा प्रभाव स्थानीय रोजगार पर पड़ा है. कठिन और श्रमसाध्य होने के बावजूद, स्थानीय मजदूर खुश हैं कि उन्हें अब पंजाब या हरियाणा जैसे राज्यों में भटकने की जरूरत नहीं है. 70 वर्षीय बुजुर्ग रामबरण महतो कहते हैं कि नई पीढ़ी को पूर्वजों की परंपरा से जुड़ते देख सुकून मिलता है.
अगला लक्ष्य: 100 किसानों को जोड़ना
मखाने की खेती को लेकर बढ़ते रुझान को देखते हुए, अगले वर्ष कम से कम 100 नए किसानों को इस मुहिम से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार रही, तो पूर्वी चंपारण जल्द ही मिथिलांचल के बाद मखाना उत्पादन का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा.
मोतिहारी बंजरिया से राज निखिल का रिपोर्ट
