मधुबनी : जिले में औसतन 57 हजार लोगों के इलाज के लिए महज एक चिकित्सक ही पदस्थापित हैं. जबकि जिले की आबादी लगभग 48 लाख है. सदर अस्पताल की स्थिति यह है कि सात चिकित्सक के सहारे यहां ओपीडी व इमरजेंसी में आने वाले मरीजों को चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध कराया जा रहा है.
गुणवत्ता पूर्ण स्वास्थ्य सेवा की सरकारी कवायद केवल कागजों तक ही सिमट कर रह गयी है. जबकि ओपीडी में प्रतिदिन इलाज के लिए लगभग 5 से 6 सौ मरीजों का रजिस्ट्रेशन किया जाता है. चिकित्सकों की कमी का आलम यह है कि मेडिसीन ओपीडी, सर्जिकल ओपीडी व स्कीन ओपीडी में दो या तीन दिन ही एक आर्थोपेडिक चिकित्सक द्वारा मरीजों को इलाज किया जाता है. शेष दिनों में एनेस्थेटिक व पैथोलॉजिस्ट चिकित्सक ही ओपीडी में आने वाले मरीजों की जांच व इलाज करते है.
जिले में चिकित्सकों की कमी का आलम यह है कि किसी अनुमंडलीय अस्पताल में एक तो किसी में दो नियमित चिकित्सक ही कार्यरत हैं. पीएचसी में एक नियमित चिकित्सक कार्यरत हैं. जिले के सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में 59 नियमित, 24 संविदारत व 57 आयुष चिकित्सक कार्यरत हैं.
कैसे हो बेहतर इलाज. सरकार द्वारा समाज के अंतिम पंक्ति के लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने को दिन प्रतिदिन नित नयी कवायद शुरू किया जा रहा है. लेकिन हकीकत यह है कि जिले में स्वीकृत पद के विरुद्ध जिला अस्पताल से पीएचसी स्तर तक महज 16 से 17 फीसदी ही चिकित्सक कार्यरत हैं. सदर अस्पताल में ही 70 के विरुद्ध मात्र 7 चिकित्सक ही कार्यरत है. ऐसे में पीएचसी, अनुमंडलीय अस्पताल, सीएचसी व एपीएचसी में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है.
यही हाल अनुमंडलीय अस्पतालों का है. अनुमंडलीय अस्पताल झंझारपुर में 30 स्वीकृत पद के विरुद्ध 10, जयनगर अनुमंडलीय अस्पताल में 30 स्वीकृत पद के विरुद्ध एक व अनुमंडलीय अस्पताल फुलपरास में 30 स्वीकृत पद के विरुद्ध 4 चिकित्सक कार्यरत हैं. अनुमंडलीय अस्पतालों में 90 चिकित्सक के स्वीकृत पद के विरुद्ध महज 15 नियमित चिकित्सक कार्यरत हैं. यही हाल रेफरल व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का है. जहां कुल 206 स्वीकृत चिकित्सक के पद के विरुद्ध मात्र 35 नियमित चिकित्सक कार्यरत हैं. जबकि स्वास्थ्य सेवा पर प्रति वर्ष स्वास्थ्य विभाग द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किया जाता है.
विभाग को दी गयी सूचना
सिविल सर्जन डा. मिथिलेश झा ने कहा है कि जिले में चिकित्सकों की कमी है. जिसकी सूचना विभाग को उपलब्ध करा दी गयी है. साथ ही राज्य स्तरीय बैठकों में भी इसपर चर्चा होती है. लेकिन सीमित संसाधनों में जिला अस्पताल से लेकर प्रखंड स्तरीय स्वास्थ्य संस्थानों में आने वाले मरीजों को बेहतर व गुणवत्ता पूर्ण स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराया जा रहा है.
