दूध के लिए बिलख रहा 11 दिनों का रोहित
मधुबनी : पाली उतर वारी टोला निवासी बबीता देवी 11 दिन के दूधमुंहे बच्चे को गोद में लिये है. बिलख रहे बच्चे को चुप कराने की जितनी कोशिश करती, बच्चा उतना ही रोता जा रहा है. आसपास की महिलाएं भी जुट गयीं. बच्चा चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था. बबीता लाचार आंखों […]
मधुबनी : पाली उतर वारी टोला निवासी बबीता देवी 11 दिन के दूधमुंहे बच्चे को गोद में लिये है. बिलख रहे बच्चे को चुप कराने की जितनी कोशिश करती, बच्चा उतना ही रोता जा रहा है. आसपास की महिलाएं भी जुट गयीं. बच्चा चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था. बबीता लाचार आंखों से अपने अगल-बगल की महिलाओं को देखती है.
रह-रह कर बच्चे को सीने से लगा कर उसे दूध पिलाने की कोशिश करती, पर जब बच्चे को दूध मिले, तब तो वह चुप हो. उसे तो अपनी मां का दूध ही नहीं मिल रहा. बबीता के सीने से पलक झपकते ही बच्चा मुंह हटा लेता. बबिता की आंखों से
दूध के लिए
दूध के लिए बिलख
अपने बच्चे की हालत देख आंसू निकल रहे थे. दरअसल जिस दिन बच्चे की छठी थी उसके सुबह ही पूरे गांव में बाढ़ का पानी घुस गया. बबीता का घर में पानी भर गया. सब कुछ पानी में ही रह गया. सात दिन के बच्चे को गोद में लिये किसी तरह वह जान बचा कर अपने पति के साथ निकल गयी. चार दिन से सड़क पर ही जीवन कट रहा है. चार दिन से बबीता को खुद भरपेट खाना नहीं मिल रहा. दूध सूख गया. बच्चा छोटा है. न तो उसे पानी दिया जा सकता और न ही अन्य कोई सूझ रहा है, जिससे बच्चे के भूख को शांत किया जा सके. रोते रोते बच्चा बेहोश हो खुद ही चुप हो जाता है. बबीता की सास बताती है कि ”बौआ लैरकोरी छइ, एकरा त दूध तखने हेतै जखन भइर पेट दाना, दूध, पथ पेट में जाई. मुदा जहिया सात दिन के बच्चा रहै. सोईरी से निकललो नै रहै तखने बाइढ आइब गेलै. ने खाना ने पथ. दूध कत से हेतै. बच्चा के जान बचनाई मुश्किल छी”
टेंपो बना आशियाना
बबीता देवी व उसके पूरे परिवार का आशियाना इन दिनों उसका टेंपो बना है. पति विमल सहनी बेनीपट्टी- बसैठ रोड में ही टेंपो चलाता है. जिस दिन से बाढ़ में घर द्वार डूबा, टेंपो चलाना भी बंद है. मुख्य सड़क पर पाली पुल के समीप बस्ती के लोग आ गये. कुछ सामान नहीं बचा. ऐसे में मजबूरी में टेंपो में ही पूरा परिवार समय काट रहा है. नवजात को लेकर खुले आसमान के नीचे रखता है. आखिर दिन भर टेंपो में तो कोई बैठ कर नहीं रह सकता. कभी बच्चे को तेज धूप लगती है, तो कभी बारिश की बूंद बच्चे पर पड़ती है. छोटी सी जान. आखिर कब तक प्रकृति की मार व विपदा को सहन कर सके. मां का दूध छूट गया है.
बीमार है. दवा भी प्रशासन ने उपलब्ध नहीं कराया है. बबीता कहती है कि ”भगवान बलू सब बिपईत हमरे लेल देलखिन. बच्चा के जान बचनाइ कठिन हई. दूध नै होई है, चारि दिन स बलू एक टेम सुखैल चूरा मिलै हई. मांड, दालि खइती तब ने दूध होइत. दूध नइ होइ है. अही बाटे बलू सब जाई हइ सब जेना आन्हरे होइ. ककरो नजईर नै पड़ै हई. खाली भोटे लइ लेल अबई हइ. आब अबि ह भोट लेल”. आस पास के लोगों ने बताया कि कुछ दूर पर पाली पुल पर बसे लोगों को प्रशासन ने पॉलीथिन व राहत तो दिया. पर उससे महज सौ मीटर के दूर पर सड़क किनारे रुके करीब बीस परिवार को कुछ भी नहीं मिला. लोगों में प्रशासन व जनप्रतिनिधि के प्रति आक्रोश था.