कुमारखंड (मधेपुरा). प्रखंड में शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर रही है. वर्ष 2007 से संचालित 18 नवसृजित प्राथमिक विद्यालय करीब दो दशक बाद भी अपनी जमीन और भवन के लिए इंतजार कर रहे हैं. इन विद्यालयों में कहीं दूसरे स्कूल के भवन में कक्षाएं संचालित की जा रही हैं तो कहीं बांस-बल्ले और छप्पर के सहारे बच्चों की पढ़ाई हो रही है. जमीन और भवन के अभाव का खामियाजा विद्यार्थियों के साथ शिक्षकों को भी भुगतना पड़ रहा है.
76 नवसृजित विद्यालयों का था प्रस्ताव, 18 अब भी भूमिहीन
जानकारी के अनुसार कुमारखंड प्रखंड में कुल 76 नवसृजित प्राथमिक विद्यालय प्रस्तावित हैं. वर्ष 2006 में प्रखंड क्षेत्र के लिए 106 विद्यालयों का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसमें 96 विद्यालयों को स्वीकृति मिली थी. स्वीकृत विद्यालयों में से 18 विद्यालय ऐसे हैं, जो अब तक भूमिहीन एवं भवनहीन हैं. इन 18 विद्यालयों में से फिलहाल मात्र एक विद्यालय के लिए भूमि उपलब्ध कराने का प्रस्ताव पारित हुआ है. शेष विद्यालयों के लिए जमीन की तलाश जारी है. करीब दो दशक से विद्यालयों के पास अपनी जमीन और भवन नहीं होने से शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है.
इन विद्यालयों के पास नहीं है अपनी जमीन
भूमिहीन विद्यालयों में नवसृजित प्राथमिक विद्यालय मकड़ी टोला विशनपुर बाजार, बैसाढ़ उत्तर भाग, अजा टोला इसरायन खुर्द, बाली मुसहरी विशनपुर सुंदर, हरिराहा रजक टोला टेंगराहा परिहारी, रामटोला परिहारी, ठुठहा मुसहरी विशनपुर सुंदर, आदिवासी टोला रहटा, सरदार टोला भोकराहा, तेलियारी टोला भोकराहा, मिरान मुसहरी इसरायन बेला, जमुआहा उत्तर टोला विशनपुर कोडलाही, अमहा टोला बेलारी, हीरापट्टी टोला लक्ष्मीपुर भगवती, रामपट्टी बेलारी, रौता, मध्य विद्यालय टिकुलिया विशनपुर बाजार तथा समिति टोला करूवैली इसरायन खुर्द शामिल हैं.
पंचायत से राज्य स्तर तक मिली थी स्वीकृति
बताया जाता है कि विद्यालयों के गठन के समय ग्राम पंचायत स्तर पर समिति का गठन कर प्रस्ताव पारित किया गया था. इसके बाद प्रस्ताव को पंचायत समिति, जिला परिषद और राज्य स्तर पर अनुमोदन के लिए भेजा गया. शिक्षा विभाग के निर्देश के बाद वर्ष 2007 से इन विद्यालयों का संचालन शुरू हुआ. विद्यालयों का संचालन शुरू हुए लंबा समय बीत चुका है, लेकिन आधारभूत सुविधाओं की स्थिति अब भी जस की तस बनी हुई है. विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक तो उपलब्ध हैं, लेकिन उनके लिए स्थायी भवन और जमीन की व्यवस्था नहीं हो सकी है.
शिक्षक हैं, लेकिन स्कूल के पास अपना भवन नहीं
वर्तमान में इन विद्यालयों में नियोजित, विशिष्ट और बीपीएससी शिक्षक बच्चों को पढ़ा रहे हैं. शिक्षकों की मौजूदगी के बावजूद विद्यालयों के पास अपना भवन नहीं होने से कक्षाओं के संचालन में परेशानी होती है. कई जगहों पर बच्चों को दूसरे विद्यालयों के भवन में पढ़ाया जा रहा है, जबकि कुछ स्थानों पर अस्थायी व्यवस्था के सहारे स्कूल चलाने की स्थिति बनी हुई है. स्थायी भवन के अभाव में बच्चों को सुरक्षित और सुविधाजनक शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराने की चुनौती बनी हुई है. वहीं शिक्षकों को भी सीमित संसाधनों के बीच शिक्षण कार्य करना पड़ रहा है.
सरकारी जमीन मिलने पर बनेगा भवन
प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी किशोर भास्कर ने बताया कि सभी भूमिहीन विद्यालयों की सूची जिलाधिकारी और जिला शिक्षा पदाधिकारी को भेज दी गई है. पंचायत स्तर पर सरकारी भूमि चिन्हित करने की प्रक्रिया चल रही है. उन्होंने बताया कि सरकारी भूमि उपलब्ध होने पर संबंधित विद्यालयों के भवन निर्माण की कार्रवाई की जाएगी. जहां सरकारी जमीन उपलब्ध नहीं होगी, वहां ग्रामीणों से दान में भूमि प्राप्त करने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी.
दो दशक बाद भी जमीन का इंतजार
वर्ष 2007 में संचालन शुरू होने के बाद करीब दो दशक का समय बीत चुका है, लेकिन 18 विद्यालयों को अब तक अपनी जमीन और भवन नहीं मिल सका है. अब विभाग की ओर से सरकारी जमीन चिह्नित करने की प्रक्रिया शुरू किए जाने से इन विद्यालयों को स्थायी भवन मिलने की उम्मीद जगी है. हालांकि जमीन उपलब्ध कराने और भवन निर्माण की प्रक्रिया पूरी होने तक बच्चों और शिक्षकों को अस्थायी व्यवस्थाओं के बीच ही पढ़ाई जारी रखनी होगी.
