लखीसराय प्रखंड का सिसमा गांव मछली पालन का बना हब
लखीसराय : जिले के युवा किसान मछली पालन कर अपने गृहस्थी को सजाने संवारने में लग चुके हैं. मछली पालन का धंधा अपना कर युवा किसान अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं. इस कार्य के लिये युवा वर्ग के किसान वर्तमान में अपने पैतृक गांव की ओर रुख कर चुके हैं. व्यवसाय से जुड़े लोग भी अब मछली पालन करने में खास रुचि ले रहे हैं. पूर्व में मछली का व्यवसाय किऊल एवं हरुहर नदी के सहारे किया जाता था. सदर प्रखंड के रामनगर, बालगुदर, नेमदारगंज, पिपरिया एवं बड़हिया से इसका व्यवसाय किया जाता था. इस व्यवसाय से वैसे लोग ही जुड़े थे जिनका नदी एवं सरकारी तालाब पर आधिपत्य रहता था.
लेकिन मछली व्यवसाय में अच्छा मुनाफा देख कर लोग अब अपनी जमीन पर तालाब खुदवा कर मछली पालन कर रहे हैं. मछली पालन का सबसे बड़ा हब इन दिनों लखीसराय प्रखंड के सिसमा गांव बना है.
इस गांव में दो दर्जन से अधिक युवा वर्ग मछली पालन व्यवसाय से जुड़ चुके हैं. इस गांव में लार्ज स्केल पर मछली व्यवसाय किया जा रहा है. सिसमा गांव के मदन कुमार एवं टनटन कुमार ने बताया कि उनके द्वारा एक एकड़ क्षेत्रफल में पोखर है जिसमें वे मछली पालन कर रहे हैं. तालाब में रेहू व कतला प्रजाति वाले मछली का बीज डाला गया है.
जो एक वर्ष में एक से डेढ़ किलो का प्रति पीस मछली तैयार हो जाता है. एक साल में लगभग 1 लाख 30 हजार की लागत आती है. जबकि तीन लाख रुपया का मछली उत्पादन किया जाता है. किसान मदन कुमार ने बताया कि वहीं जासर प्रजाति का जीरा मछली एक साल में दो बार एक किलो से डेढ़ किलो का तैयार हो जाता है. एक साल मे जासर मछली में 12 लाख रुपये की लागत आती है. जबकि उत्पादन लगभग 20 लाख रुपये का होता है. यह मछली 4 से 5 महीना में तैयार हो जाता है. सिसमा में मूल रूप से रेहू, कतला, जासर, निर्जल नस्ल की मछली पालन किया जाता है. मछली पालन में यह गांव जिले मे अव्वल स्थान रखता है. पिछले वर्ष मत्स्य विभाग के प्रधान सचिव एन विजयालक्ष्मी सिसमा गांव पहुंच कर वहां के युवा किसानों को फीड्स की फैक्ट्री खुलवाने का दिलासा दिया था.
जबकि तत्कालीन डीएम सुनील कुमार मछली पालन कर रहे किसानों को प्रोत्साहित करने को लेकर दो तीन बार विजिट भी किये थे. जिसमें किसानों को हर संभव मदद दिलाने का आश्वासन दिया था, लेकिन अब तक कुछ नहीं हो पाया है. किसान गौरव कुमार उर्फ कारु ने बताया कि पारंपरिक तरीके छोड़ कर अगर मछली पालन वैज्ञानिक तरीके से किया जाता तो यहां के किसान काफी तरक्की कर सकते हैं. सरकारी पोखर के मछली पालक व कई किसानों ने बताया कि पूर्व में उन्हें अनुदानित दर पर फीड्स एवं मछली जीरा उपलब्ध कराया जाता था. लेकिन वर्तमान में वह भी बंद पड़ा है. रेहू व कतला मछली जीरा तीन से चार सौ रुपया प्रति किला बाजार मूल्य पर उपलब्ध होता है. जबकि जासर व निर्जल 350 से 400 रुपये प्रति किलो मिलता है.
बोले अधिकारी
जिला मत्स्य पदाधिकारी अजय कुमार ने बताया कि फीड्स पर अनुदान वर्तमान में नहीं दिया जा रहा है. जीरा पर जून महीने में अनुदान दिया जाता है. उन्होंने कहा कि वक्त वक्त पर किसानों को प्रशिक्षण के लिये पटना भेजा जाता है.
