Surjapuri Mango Variety: आम को यूं ही फलों का राजा नहीं कहा जाता, लेकिन जब बात सीमांचल के पारंपरिक ‘सुरजापुरी आम’ की हो, तो इसके स्वाद की कड़ियां देश की अन्य सभी मशहूर किस्मों (जैसे अलफांसो या जरदालू) पर भारी पड़ती हैं. बिहार के किशनगंज, पूर्णिया और पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले की विशेष बलुई-दोमट मिट्टी व जलवायु में पैदा होने वाले इस आम की मिठास और सोंधी सुगंध का कोई सानी नहीं है. पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में इस आम की भारी डिमांड होने के बावजूद, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे आज तक वह मुकाम या जीआई टैग (GI Tag) नहीं मिल सका, जिसका यह हकदार था. नतीजतन, उचित बाजार और सरकारी प्रोत्साहन न मिलने से यह ऐतिहासिक नस्ल अब धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है.
‘मक्खन’ जैसा गूदा और अनोखी खूबी— यह आम सड़ता नहीं, बल्कि सूखता है!
सुरजापुरी आम की बागवानी करने वाले पुराने किसानों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस फल की कई अनूठी कड़ियां और विशेषताएं हैं जो इसे वैश्विक स्तर पर खास बनाती हैं:
- रेशारहित क्रीम जैसा टेक्सचर: इस आम की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) इसका पूरी तरह से रेशारहित (Fibreless) होना है. इसका गूदा इतना मुलायम और रसीला होता है कि स्थानीय लोग इसे क्रीम या मक्खन की तरह ब्रेड और रोटियों पर लगाकर खाते हैं. रेशा न होने के कारण यह बेहद सुपाच्य होता है.
- अनोखा लाइफ-साइकिल: इस फल की एक चमत्कारी विशेषता यह है कि यह आम पकने के बाद अन्य किस्मों की तरह सड़ता या गलता नहीं है, बल्कि पेड़ पर या टूटने के बाद भी धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से सूखने लगता है.
- सुरजापुरी नाम के पीछे का इतिहास: पूर्व काल में इस पूरे सीमावर्ती भूभाग को ऐतिहासिक और सरकारी दस्तावेजों में ‘परगना सुरजापुरी’ के नाम से जाना जाता था, इसी भाषाई और क्षेत्रीय संस्कृति के आधार पर इस फल का नामकरण ‘सुरजापुरी आम’ हुआ.
कच्चे में खट्टा और पके में बेजोड़ मिठास; चटनी-अचार के लिए पहली पसंद
स्थानीय बाजारों के आढ़तियों का कहना है कि सुरजापुरी आम का इस्तेमाल इसके पूरे सीजन में बहुआयामी तरीके से होता है:
- प्रारंभिक अवस्था: टिकोला (कच्ची अवस्था) में यह आम अत्यधिक खट्टा होता है. इसके इसी तीखे खट्टेपन के कारण सीमांचल के घरों में इसकी चटनी, आम पन्ना और सालों-साल चलने वाला पारंपरिक कुच्चा व सरोता अचार बड़े चाव से बनाया जाता है.
- परिपक्व अवस्था: जून के मध्य में जब यह आम पूरी तरह डाल पर पक जाता है, तो इसकी मिठास का स्तर (Sugar Content) अन्य आमों के मुकाबले कई गुना बढ़ जाता है.
सरकारी उदासीनता और कीटों के प्रकोप से उजड़ रहे हैं सुरजापुरी के बाग
“कृषि विभाग हर साल सरकारी नर्सरियों से मालदा, बंबइया और कलकतिया आम के कलमी पौधे तो बांटता है, लेकिन सुरजापुरी आम की कलम तैयार करने या इसके पौधों को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर कोई बजटीय प्रावधान नहीं है.”
ठाकुरगंज और पोठिया प्रखंड के आम उत्पादक किसानों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले तीन वर्षों से क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के कारण सुरजापुरी आम के पेड़ों पर ‘मिल्ड्यू’ और ‘फ्रूट फ्लाई’ जैसे लाइलाज कीटों का प्रकोप तेजी से बढ़ा है. कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से कीट नियंत्रण के लिए कोई विशेष तकनीकी मार्गदर्शन या कीटनाशक अनुदान नहीं दिया जा रहा है. उचित देखरेख न होने और पुराना पेड़ सूखने के बाद किसान अब मजबूरन इन बागों को काटकर व्यावसायिक इमारती लकड़ियों के पौधे लगा रहे हैं.
संरक्षण और संवर्धन के लिए विशेष पैकेज की मांग: इतिहास बनने से बचाए सरकार
सीमांचल के प्रबुद्ध नागरिकों, किसान यूनियनों और पर्यावरणविदों ने बिहार सरकार के कृषि विभाग, उद्यान निदेशालय और जिला प्रशासन से इस दुर्लभ प्रजाति को बचाने के लिए युद्ध स्तर पर विशेष संवर्धन योजना (Special Conservation Scheme) शुरू करने की मांग की है.
किसानों के मुख्य सुझाव और मांगें:
- सरकारी नर्सरी में प्राथमिकता: जल-जीवन-हरियाली या अन्य वृक्षारोपण अभियानों के तहत वितरित होने वाले फलदार पौधों में कम से कम 30% हिस्सेदारी सुरजापुरी आम की कलमों की अनिवार्य की जाए.
- अनुसंधान की जरूरत: पूसा कृषि विश्वविद्यालय या सबौर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की एक टीम को ठाकुरगंज भेजकर इसके कीटों पर शोध कराया जाए.
- जीआई टैग की पहल: यदि समय रहते इस स्वदेशी और रसीली वैरायटी को ब्रांडिंग, पैकेजिंग और सरकारी संरक्षण का संबल नहीं मिला, तो आने वाली पीढ़ियां सुरजापुरी आम के बेजोड़ स्वाद से पूरी तरह महरूम रह जाएंगी और यह सिर्फ इतिहास की किताबों का हिस्सा बनकर रह जाएगा.
