सीमांचल के ग्रामीण क्षेत्रों में धान की रोपनी का मुख्य काम पूरा होते ही स्थानीय स्तर पर रोजगार की कमी महसूस होने लगी है. इसके साथ ही क्षेत्र के ग्रामीण मजदूरों और कामगारों का रोजी-रोटी की तलाश में देश के दूसरे राज्यों की ओर मौसमी पलायन (Seasonal Migration) शुरू हो गया है. शनिवार को किशनगंज जिले के ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन पर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र जाने वाले यात्रियों व मजदूरों का भारी हुजूम देखने को मिला.
खेतों में काम बंद, अब दूसरे राज्यों का सहारा
सीमांचल के ग्रामीण इलाकों में धान की रोपनी के दौरान मजदूरों को गांव और आसपास में ही रोजगार उपलब्ध हो जाता है:
- स्थानीय रोजगार का अभाव: रोपनी समाप्त होते ही गांवों में काम का अवसर समाप्त हो जाता है. कृषि की बढ़ती लागत, छोटी जोत और उद्योग-धंधों की कमी के कारण मजदूर हर साल खेतों का काम निपटाकर पलायन करने को मजबूर होते हैं.
- विभिन्न पेशों के लोग शामिल: बाहर जाने वालों में न केवल मजदूर, बल्कि राजमिस्त्री, कारीगर, चालक (Drivers), सुरक्षाकर्मी और निजी क्षेत्रों में काम करने वाले युवक भी शामिल हैं.
अमृत भारत एक्सप्रेस से पंजाब की राह हुई आसान
पंजाब जाने वाले रेल यात्रियों के लिए न्यू जलपाईगुड़ी (NGP) - अमृतसर 'अमृत भारत एक्सप्रेस' एक बड़ी राहत साबित हो रही है:
- सीधी रेल सेवा: सीमांचल से सीधे पंजाब के लिए सीधी ट्रेन मिलने से अब यात्रियों को कटिहार, बरौनी या कानपुर जैसे बड़े जंक्शनों पर जाकर ट्रेन बदलने और भटकने की परेशानी से मुक्ति मिली है.
- काउंटरों पर लंबी कतारें: शनिवार को ठाकुरगंज स्टेशन के यूटीएस (अनारक्षित टिकट) काउंटरों पर सामान्य श्रेणी का टिकट लेने के लिए यात्रियों की लंबी कतारें लगी रहीं. रेलवे सूत्रों के मुताबिक, सामान्य दिनों की तुलना में टिकटों की बिक्री में कई गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
विदाई की भावुक तस्वीरें और स्थायी समाधान की मांग
स्टेशन पर कई परिवार अपने घर के कमाने वाले सदस्यों को छोड़ने पहुंचे थे. अपनों से दूर जाने की मजबूरी और रोजी-रोटी की चिंता स्टेशन परिसर में साफ दिखाई दे रही थी.
स्थानीय बुद्धिजीवियों और ग्रामीणों का कहना है कि किशनगंज, ठाकुरगंज, बहादुरगंज, टेढ़ागाछ और दिघलबैंक जैसे सीमांचल के इलाकों से हर साल बड़े पैमाने पर पलायन होता है. जब तक क्षेत्र में कृषि आधारित प्रसंस्करण उद्योग (Agro-based Industries) और रोजगार के स्थायी साधन विकसित नहीं किए जाएंगे, तब तक सीमांचल से पलायन की यह मजबूरी भरी तस्वीर हर साल इसी तरह सामने आती रहेगी.
