पौआखाली से रणविजय की रिपोर्ट
Ancient Mound: सीमावर्ती किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड के बंदरझूला पंचायत स्थित कन्हैयाजी हाट का प्राचीन टीला ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से अंतरराष्ट्रीय महत्व का होने के बावजूद आज भी कतिपय प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है. भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा के बेहद नजदीक स्थित यह स्थल एक अन-उत्खनित (Un-excavated) खजाना है. लोक मान्यताओं में जहाँ इसका जुड़ाव द्वापर युग और पांडवों के अज्ञातवास से है, वहीं जमीन से निकलने वाले भौतिक साक्ष्य इसे गुप्त और पाल राजवंश के समृद्ध कालखंड से जोड़ते हैं. हालांकि, पर्याप्त प्रचार-प्रसार और सरकारी संबल न मिलने के कारण यह अद्भुत धरोहर अब तक बिहार के मुख्य पर्यटन स्थलों की कड़ियों में शुमार नहीं हो पाई है.
द्वापर युग से जुड़ी कड़ियां: राजा विराट का मत्स्य देश और कीचक वध की भूमि
इस ऐतिहासिक स्थल की सांस्कृतिक और पौराणिक पृष्ठभूमि बेहद समृद्ध है, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- पांडवों का अज्ञातवास: स्थानीय लोक कथाओं और परंपराओं के अनुसार, ठाकुरगंज का यह पूरा सीमावर्ती इलाका द्वापर युग में राजा विराट के ‘मत्स्य देश’ की राजधानी या उसका मुख्य हिस्सा था. पांडवों ने अपने 1 वर्ष के कड़े अज्ञातवास का एक बड़ा समय इसी क्षेत्र में छिपकर बिताया था.
- महाबली कीचक का वध: माना जाता है कि द्रौपदी के अपमान का बदला लेने के लिए महाबली भीम ने विराट के साले कीचक का वध इसी टीले के समीपवर्ती (वर्तमान नेपाल) क्षेत्र में किया था. इस क्षेत्र की मिट्टी और भौगोलिक कड़ियां आज भी इन कथाओं को जीवंत करती हैं.
खुदाई में मिलीं काले पत्थर की दुर्लभ मूर्तियां; पाल काल की स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना
कन्हैयाजी हाट और बंदरझूला के इस प्राचीन टीले के आसपास समय-समय पर होने वाले भू-कटाव और आंशिक खुदाई से कई बेशकीमती कड़ियां सामने आई हैं:
- दुर्लभ प्रतिमाएं: यहाँ से पाल कालीन स्थापत्य कला (8वीं से 12वीं शताब्दी) से निर्मित चमकीले काले कसौटी पत्थर की अत्यंत दुर्लभ मूर्तियां मिली हैं, जिनमें भगवान विष्णु और सूर्य देव की भव्य प्रतिमाएं शामिल हैं.
- कन्हैयाजी हाट का नामकरण: भगवान श्रीकृष्ण के प्रति स्थानीय समाज की अटूट आस्था के कारण ही इस पूरे व्यापारिक केंद्र का नाम ‘कन्हैयाजी हाट’ पड़ा. टीले की बनावट और ईंटों के आकार से स्पष्ट होता है कि यहाँ प्राचीन काल में कोई विशाल धार्मिक विश्वविद्यालय या भव्य मंदिर परिसर स्थापित था.
ASI ने 100 मीटर का दायरा किया निषिद्ध; नियम तोड़ने पर 1 लाख का जुर्माना और जेल
कानूनी चेतावनी: “इस पुरातात्विक स्मारक की ऐतिहासिकता और मिट्टी में दबे रहस्यों को सुरक्षित रखने के लिए भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने कड़े नियम लागू किए हैं.”
प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 के तहत टीले की सुरक्षा के लिए निम्नलिखित कड़ियां जोड़ी गई हैं:
- निर्माण पर पूर्ण रोक: टीले के मुख्य केंद्र से 100 मीटर की सीमा के भीतर किसी भी प्रकार के नए निर्माण, पुनर्निर्माण, मकानों की मरम्मत या मिट्टी खनन/खुदाई को पूरी तरह से प्रतिबंधित (निषिद्ध) कर दिया गया है.
- दंडात्मक कार्रवाई: यदि कोई व्यक्ति या भू-माफिया इन नियमों की अवहेलना करता है, तो कानूनन उसे 2 वर्ष का कठोर कारावास (जेल) और 100,000 रुपये का नकद अर्थदंड (जुर्माना), या दोनों सजाएं एक साथ भुगतनी पड़ सकती हैं.
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों ने राज्य के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग से मांग की है कि इस टीले का व्यवस्थित रूप से वैज्ञानिक उत्खनन कराया जाए ताकि सीमांचल के इस छिपे हुए गौरवशाली इतिहास की कड़ियां दुनिया के सामने आ सकें और इसे एक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर्यटन हब (Border Tourism Hub) के रूप में विकसित किया जा सके.
