प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) किशनगंज (बेलवा) में प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी का प्रभार हस्तांतरण का मामला पिछले 15 दिनों से लटका हुआ है. सरकारी आदेशों की अनदेखी के कारण न केवल अस्पताल की प्रशासनिक व स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है, बल्कि विभाग की साख पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. आदेश के दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी जमीनी हकीकत जस की तस बनी हुई है.
क्या था स्वास्थ्य विभाग का आधिकारिक आदेश?
स्वास्थ्य विभाग ने 20 जुलाई 2026 को पत्रांक 2506 जारी कर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे:
- प्रतिनियुक्ति समाप्त: डॉ. आफताब आलम की बेलवा पीएचसी में प्रतिनियुक्ति तत्काल प्रभाव से समाप्त करते हुए उन्हें उनके मूल पदस्थापन एएचसी करुआमणी (दिघलबैंक) वापस भेजने का आदेश दिया गया था.
- नए प्रभारी व डीडीओ: पीएचसी किशनगंज का पूरा चार्ज डॉ. जय प्रकाश विश्वास को सौंपने और उन्हें प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी के साथ-साथ आय-व्ययक (DDO) की जिम्मेदारी देने का निर्देश जारी हुआ था.
- आदेश की प्रतियां: इस पत्र की प्रतिलिपि जिला कोषागार, डीएम कार्यालय और पटना स्वास्थ्य विभाग को भेजी गई थी.
कागजों में आदेश, धरातल पर दावों का संकट
सरकारी पत्राचार के बावजूद बेलवा पीएचसी में स्थिति नहीं बदली है:
- आदेश का उल्लंघन: डॉ. आफताब आलम अब भी पीएचसी किशनगंज में प्रभारी के तौर पर डटे हुए हैं और पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं.
- प्रभार का इंतजार: मनोनीत नए प्रभारी डॉ. जय प्रकाश विश्वास का कहना है कि विभागीय आदेश उन तक पहुंच चुका है, लेकिन उन्हें अब तक आधिकारिक रूप से प्रभार नहीं सौंपा गया है.
उठ रहे कई तीखे सवाल:
- कार्रवाई से बेखौफ: विभागीय आदेश जारी होने के 15 दिन बाद भी सिविल सर्जन कार्यालय और जिला प्रशासन इस मामले में मौन क्यों है?
- वित्तीय जोखिम: जब पदस्थापन और डीडीओ का अधिकार आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका है, तो क्या वित्तीय फाइलों और हस्ताक्षरों में कल को होने वाली गड़बड़ी की जवाबदेही तय होगी?
- स्वास्थ्य सेवाओं पर असर: फाइलें अटकने और प्रशासनिक खींचतान के कारण अस्पताल में दवा आपूर्ति, कर्मचारियों के वेतन और नियमित स्वास्थ्य सेवाओं पर बुरा असर पड़ रहा है.
मरीजों और स्थानीय लोगों में आक्रोश
प्रभार के इस पेच में आम मरीजों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जब विभाग अपने ही तबादले और प्रभार के आदेश लागू कराने में नाकाम साबित हो रहा है, तो आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं कैसे मिलेंगी.
अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और सिविल सर्जन कार्यालय पर टिकी हैं कि वे इस मामले में कब हस्तक्षेप कर विभागीय आदेश का अनुपालन कराते हैं.
