लगातार दो वर्षों में 10 पुरुषों को नसबंदी के लिए किया प्रेरित; समाज की ”सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी” वाली सोच को दी चुनौती
किशनगंज. भारतीय समाज में परिवार नियोजन का बोझ अक्सर महिलाओं के कंधों पर ही डाल दिया जाता है. लेकिन किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड की एक आशा कार्यकर्ता, उषा देवी ने इस पुरानी धारणा को बदलकर एक नई राह दिखाई है. उन्होंने न केवल पुरुष नसबंदी से जुड़ी भ्रांतियों को खत्म किया, बल्कि पिछले दो वर्षों में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर जिले में प्रेरणा का स्रोत बन गयी हैं.दो वर्षों की उपलब्धि
उषा देवी के धैर्य व सही संवाद का ही नतीजा है कि पुरुष अब इस जिम्मेदारी में हाथ बंटाने के लिए आगे आ रहे हैं. वर्ष 2024 में अपने क्षेत्र के छह पुरुषों को नसबंदी के लिए सफलतापूर्वक प्रेरित किया. वर्ष 2025 में इस सिलसिले को जारी रखते हुए चार और पुरुषों को इस प्रक्रिया के लिए तैयार किया.डर व झिझक के बीच ”विश्वास” की जीत
ग्रामीण इलाकों में पुरुष नसबंदी पर बात करना आज भी एक चुनौती है. कमजोरी आने या मर्दानगी कम होने जैसे भ्रम पुरुषों को इस निर्णय से दूर रखते हैं. उषा देवी ने घर-घर जाकर इन भ्रांतियों पर प्रहार किया. उन्होंने पुरुषों को समझाया कि यह एक अत्यंत सुरक्षित और सरल प्रक्रिया है, जिसका शारीरिक क्षमता या कामकाज पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता.प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग का मिला संबल
उषा देवी की इस पहल को जिला प्रशासन का भी पूरा समर्थन मिल रहा है. जिला पदाधिकारी विशाल राज ने स्पष्ट किया है कि परिवार नियोजन में पुरुषों की भागीदारी सुनिश्चित करना प्राथमिकता है. सिविल सर्जन डॉ राज कुमार चौधरी के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग आशा कार्यकर्ताओं को विशेष प्रशिक्षण दे रहा है ताकि समाज में पुरुष नसबंदी को लेकर सकारात्मक वातावरण बनाया जा सके.राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा संदेश
ठाकुरगंज की यह छोटी सी पहल एक बड़े सामाजिक परिवर्तन का संकेत है. उषा देवी की कहानी साबित करती है कि यदि जमीनी स्तर पर सही नेतृत्व व समर्पण हो, तो वर्षों पुरानी रूढ़िवादी सोच को बदला जा सकता है. आज वे न केवल एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, बल्कि उन हजारों कर्मियों के लिए रोल मॉडल हैं जो बदलाव की मशाल थामे हुए हैं.—
“परिवार नियोजन केवल महिला की नहीं, बल्कि स्त्री-पुरुष दोनों की साझा जिम्मेदारी है. जब समाज इस सच को स्वीकारेगा, तभी एक स्वस्थ परिवार संभव है. ” — उषा देवी, आशा.—
