मैं नदिया फिर भी मैं प्यासी...

हाल यहां तक खराब है कि सालों भर बह कर लोगों को जल देने वाली नदी कनकई, बूढ़ी कनकई, महानंदा, आज गाद और बालू के भराव से पानी को तरस रही है. नदी तल ऊपर उठने से तटबंध टूटने का खतरा भी अधिक हो गया है, जिससे नदी के आस पास रहने वाले गांवों के […]

हाल यहां तक खराब है कि सालों भर बह कर लोगों को जल देने वाली नदी कनकई, बूढ़ी कनकई, महानंदा, आज गाद और बालू के भराव से पानी को तरस रही है. नदी तल ऊपर उठने से तटबंध टूटने का खतरा भी अधिक हो गया है, जिससे नदी के आस पास रहने वाले गांवों के लोगों व पशुओं पर भी इसका व्यापक असर देखा जा रहा है.

(किशनगंज) : सीमांचल को समृद्ध रखने वाली नदियां सिकुड़ रही है. इस कारण कृषि कार्य तो प्रभावित हो ही रहा है पर्यावरण पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है. हाल यहां तक खराब है कि सालों भर बह कर लोगों को जल देने वाली नदी कनकई, बुढ़ी कनकई, महानंदा, आज गाद और बालू के भराव से पानी को तरस रही है. नदी तल उपर उठने से तटबंध टूटने का खतरा भी अधिक हो गया है. जिससे नदी के आस पास रहने वाले गांवों के लोगों व पशुओं पर भी इसका व्यापक असर देखा जा रहा है. कुछ वर्ष पूर्व तक नदी के जल से सिंचाई हो जाती थी. जो अब संभव नहीं है.
नदियों का अस्तित्व संकट में
सीमावर्ती क्षेत्र नदियों का नैहर अर्थात मायका के रूप में प्रसिद्ध रहा है. नेपाल की पहाड़ियों से यात्रा शुरू कर ये सभी नदियां किशनगंज जिले की सीमा में प्रवेश करते हुए अन्य जिलों की ओर बहती है जिस कारण यहां पानी की समस्या नहीं आती थी मगर अब हालात बदल गये है.
कम होती नदी की गहराई
नदियों के जल के साथ भारी मात्रा में बह कर आने वाली बालू एवं कंकड़ पत्थर ने नदियों के गहरायी को ही खत्म कर दिया है. साथ ही नदी के किनारे अवैध रूप से हो रहे खनन ने इसकी धारा भी बदल दी है. लिहाजा बाढ़ बरसात के समय ये नदियां ऊफन कर तट के आस पास जम कर कहर बरपाती है. खास कर नदियों के पेटी में बालू का जमाव खतरनाक स्थिति तक पहुंच गया है. स्वच्छ और मुफ्त होकर बहाव करने को छटपटा रही नदियां अपने तट के भीतर ही दर्जनों शाखाओं का निर्माण कर बहाव कर रही है. वहीं वर्तमान समय में प्रखंड की नदी रेगिस्तान का रूप ले चुकी है. जहां पानी तो नहीं है मगर हर तरफ बालू ही बालू नजर आता है.
करोड़ों रुपये हो चुके हैं खर्च
कटाव रोकने को लेकर अब तक करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं औरहर साल होते रहते हैं. मगर इसके फायदे कम ही दिखते है. जानकारों की माने तो नदियों को रोकने या बांधने के प्रयास कभी सफल नहीं हो सकता है. हां इसकी गहरायी को सुरक्षित रखने के लिए बड़े योजना की आवश्यकता है.
हजारों की आबादी प्रभावित
कहा जाता है कि नदियों के बगैर सभ्यता का विकास नहीं हो सकता तभी तो इसके किनारे पर कभी बेहतर फसल उगायी जाती थी. मगर अब नदियों के किनारे की भूमि पूरी तरह बंजर हो गयी है. कारण बालुओं का जमावड़ा और तो और हर साल किसी न किसी नदी का बांध टूटना ही है लिहाजा दोनों ओर से नुकसान हो रहा है. गर्मी के दिनों में नदियों के सुख जाने से सिंचाई तो दूर पशुओं को पानी पिलाने में भी कठिनाई आती है.
लगातार बदलती है नदी की धारा
इस सब के बीच नदियां हर साल अपने मुख्य धारा से भटक रही है. जिसका खामियाजा किनारों पर बसे गांवों एवं बाजारों को भुगतना पड़ रहा है. नदी के कटाव के कारण गर्न्धवडांगा हाट का एक बड़ा हिस्सा नदी के गर्भ में समा चुका है. आगे भी इसमें कटाव की संभावना जतायी जा रही है. कमोवेश यही हालत मंदिर टोला पलसा सहित कई अन्य इलाकों की है.

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