बिना हाथों के पैरों से लिख रही भविष्य की नई कहानी, हसनगंज की लक्ष्मी को है सरकारी मदद का इंतजार

जन्म से दोनों हाथों के बिना, 12 वर्षीय लक्ष्मी कुमारी पैरों से लिखकर शिक्षा प्राप्त कर रही है और शिक्षिका बनने का सपना देखती है. बिहार के कटिहार की यह बच्ची आर्थिक तंगी के बावजूद हौसले की मिसाल है.

Katihar News: कुछ कहानियां केवल खबर नहीं होतीं, बल्कि हौसले की ऐसी मिसाल बन जाती हैं जो समाज को नई सोच देती हैं. कटिहार जिले के हसनगंज प्रखंड के भतौरिया गांव की 12 वर्षीय लक्ष्मी कुमारी ऐसी ही एक बच्ची है. जन्म से दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद वह पैरों से लिखती है, पढ़ाई करती है और बड़ी होकर शिक्षिका बनने का सपना देख रही है. आर्थिक तंगी के बीच उसका संघर्ष और आत्मविश्वास लोगों को भावुक भी करता है और प्रेरित भी.

पैरों को ही बना लिया अपनी ताकत

लक्ष्मी कुमारी जन्म से दोनों हाथों से वंचित है. लेकिन उसने अपनी शारीरिक स्थिति को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया. वह अपने पैरों के सहारे कॉपी पर लिखती है, किताबें पढ़ती है और रोजमर्रा के कई काम खुद करने की कोशिश करती है.

पैरों से चम्मच पकड़कर खाना खाना, लिखना और पढ़ाई करना उसके लिए आसान नहीं है, लेकिन उसने हार मानने के बजाय इन्हीं पैरों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है.

रोज स्कूल जाती है और पूरी लगन से पढ़ती है

भतौरिया गांव के विद्यालय में लक्ष्मी नियमित रूप से पहुंचती है. वह कक्षा में अन्य बच्चों की तरह बैठकर पढ़ाई करती है और पैरों से लिखने का अभ्यास करती है.

उसकी मेहनत और अनुशासन ने शिक्षकों और ग्रामीणों दोनों को प्रभावित किया है.

कक्षा शिक्षिका रिंकू कुमारी बताती हैं कि लक्ष्मी पढ़ाई को लेकर बेहद गंभीर है. वह पैरों से लिखने में लगातार मेहनत करती है और कभी भी पढ़ाई से पीछे नहीं हटती.

विद्यालय के प्रधानाध्यापक विनय कुमार चौधरी भी कहते हैं कि लक्ष्मी का हौसला दूसरे बच्चों के लिए प्रेरणा है. शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद उसकी नियमितता और सीखने की ललक असाधारण है.

शिक्षिका बनने का सपना देखती है लक्ष्मी

लक्ष्मी की सबसे बड़ी इच्छा पढ़-लिखकर शिक्षिका बनने की है. वह चाहती है कि भविष्य में बच्चों को पढ़ाए और अपने परिवार का सहारा बने.

उसकी मां रेणु देवी कहती हैं कि बेटी पढ़ना चाहती है और अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है. परिवार अपनी क्षमता के अनुसार उसका साथ दे रहा है, लेकिन आर्थिक परेशानियों के कारण कई जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं.

पिता मजदूरी करते हैं, मां करती हैं देखभाल

लक्ष्मी के पिता रामदेव यादव ईंट-भट्ठे में मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं. मां रेणु देवी घर पर रहकर लक्ष्मी की देखभाल करती हैं.

दोनों हाथ नहीं होने के कारण लक्ष्मी को कई कार्यों में सहायता की जरूरत पड़ती है. इसी वजह से उसकी मां भी बाहर जाकर काम नहीं कर पातीं.

परिवार का कहना है कि सीमित आय में बेटी की पढ़ाई, इलाज और अन्य जरूरतों को पूरा करना बेहद कठिन हो जाता है.

दिव्यांग पेंशन का अब तक नहीं मिला लाभ

परिजनों के अनुसार लक्ष्मी को अब तक दिव्यांग पेंशन का लाभ नहीं मिल पाया है.

परिवार को उम्मीद है कि सरकार और प्रशासन उसकी स्थिति का संज्ञान लेकर आवश्यक सहायता उपलब्ध कराएंगे, ताकि आर्थिक अभाव उसकी शिक्षा और सपनों के बीच बाधा न बने.

गांव वाले कहते हैं, यह बच्ची हौसले की मिसाल है

गांव की फेकिया देवी, कंचन देवी और प्रेम पोद्दार जैसे ग्रामीणों का कहना है कि लक्ष्मी की मेहनत देखकर हर कोई प्रभावित हो जाता है.

दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद जिस तरह वह पैरों से लिखकर पढ़ाई कर रही है, वह समाज के लिए प्रेरणादायक उदाहरण है.

ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि लक्ष्मी को नियमानुसार दिव्यांग पेंशन और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ जल्द दिलाया जाए.

Katihar News: जरूरत सिर्फ सहारे की नहीं, अवसर की है

लक्ष्मी की कहानी केवल एक दिव्यांग बच्ची के संघर्ष की कहानी नहीं है. यह आत्मनिर्भरता, शिक्षा के प्रति समर्पण और मजबूत इच्छाशक्ति की कहानी है.

वह पैरों से केवल कॉपी पर अक्षर नहीं लिख रही, बल्कि अपने भविष्य की नई इबारत लिख रही है.

जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग उसके परिवार की आर्थिक स्थिति का संज्ञान ले और उसे दिव्यांग पेंशन, शिक्षा सहायता और अन्य पात्र सरकारी योजनाओं से जोड़े, ताकि एक प्रतिभाशाली बच्ची का सपना संसाधनों के अभाव में अधूरा न रह जाए.

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लेखक के बारे में

By विजय कुमार

विजय कुमार गुप्ता ने वर्ष 2015 में प्रिंट माध्यम से पत्रकारिता की शुरुआत की. पत्रकारिता के क्षेत्र मे स्थानीय लोगों की मूलभूत समस्याओं को प्रमुखता से लिखना और शिक्षा व स्वास्थ्य में रुचि रखते हैं.

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