कटिहार के हसनगंज प्रखंड क्षेत्र में भाई-बहन के प्रेम और पारंपरिक लोक संस्कृति से जुड़ा करमा-धरमा पर्व बड़े धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ शुरू हो गया है. सात दिनों तक चलने वाले इस पर्व को लेकर गांवों में उत्सवी माहौल देखने को मिल रहा है. किशोरियों, युवतियों और महिलाओं ने पर्व की तैयारियां शुरू कर दी हैं. बहनें अपने भाइयों की लंबी आयु, सुख-शांति और समृद्धि की कामना कर रही हैं. करमा-धरमा पर्व सिर्फ धार्मिक आस्था से जुड़ा आयोजन नहीं है, बल्कि इसमें ग्रामीण जीवन, लोकगीत, सामूहिक नृत्य और भाई-बहन के रिश्ते की परंपरा भी देखने को मिलती है. पर्व के दौरान महिलाएं और युवतियां समूह में पूजा-अर्चना करती हैं और पारंपरिक गीतों के साथ जावा की पूजा करती हैं.
सुबह नदी या तालाब पर पहुंचती हैं महिलाएं और युवतियां
करमा-धरमा पर्व की तैयारी के तहत गांव की किशोरियां, युवतियां और महिलाएं सुबह नदी या तालाब पर स्नान करने जाती हैं. इस दौरान वे अपने साथ बांस की नई टोकरी और पूजा सामग्री लेकर जाती हैं. नदी या तालाब से बालू लाकर टोकरी में रखा जाता है. इसके बाद उसमें बादाम, मूंग, जौ, कुर्थी और मटर सहित पांच प्रकार के बीज बोए जाते हैं.
बीज बोने की इस प्रक्रिया को स्थानीय परंपरा में "जावा उठाना" कहा जाता है. इसके बाद लगातार सात दिनों तक जावा डाली की पूजा की जाती है. सुबह, दोपहर और शाम पूजा-अर्चना के साथ महिलाएं और युवतियां जावा के चारों ओर घूमकर पारंपरिक गीत गाती हैं और नृत्य करती हैं.
सात दिनों की पूजा के बाद एकादशी की रात होता है मुख्य अनुष्ठान
करमा-धरमा पर्व का मुख्य अनुष्ठान एकादशी के दिन होता है. इस दिन महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखती हैं. इसके बाद करमा नामक पेड़ की डाली के साथ अन्य पेड़ों की शाखाओं और करमा-धरमा की मूर्ति तैयार कर विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है.
रात में पूजा के बाद महिलाएं और युवतियां देर रात तक पारंपरिक गीत गाती और नृत्य करती हैं. इस दौरान गांवों में सामूहिक रूप से पर्व मनाने की परंपरा देखने को मिलती है. अगले दिन सुबह जावा डाली और पूजा में इस्तेमाल की गई अन्य शाखाओं को नदी या तालाब में प्रवाहित कर दिया जाता है.
भादो शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है पर्व
स्थानीय मान्यता के अनुसार करमा-धरमा पर्व भादो माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है. इसे पद्मा एकादशी और भादो एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. पर्व के अवसर पर लोग अच्छी फसल और घर-परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं.
ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व का संबंध कृषि और प्रकृति से भी जोड़ा जाता है. जावा में अलग-अलग बीज बोने और उसकी पूजा करने की परंपरा के माध्यम से बेहतर फसल की कामना की जाती है. इसी वजह से ग्रामीण समाज में इस पर्व का सांस्कृतिक महत्व काफी पुराना माना जाता है.
करमा-धरमा की कहानी के बिना अधूरी मानी जाती है पूजा
करमा-धरमा पर्व के दौरान करमा और धरमा नाम के दो भाइयों की कहानी भी सुनाई जाती है. स्थानीय परंपरा में इस कथा को पर्व के महत्व और उसके संदेश से जोड़कर देखा जाता है. मान्यता है कि करमा-धरमा की कथा सुने बिना कर्मा पूजा अधूरी मानी जाती है. पर्व के दौरान कहानी सुनने और सुनाने की यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही लोक संस्कृति का हिस्सा है. बुजुर्गों द्वारा नई पीढ़ी को करमा-धरमा से जुड़ी कथा और परंपराओं के बारे में बताया जाता है, जिससे लोक संस्कृति और पर्व की मान्यताएं आगे भी बनी रहें.
भाई की सलामती के लिए बहनों की आस्था
करमा-धरमा पर्व को भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है. महिलाएं और युवतियां अपने भाइयों की सलामती, लंबी आयु और अच्छे भविष्य के लिए व्रत रखती हैं. पूजा के दौरान परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की भी कामना की जाती है. स्थानीय लोगों के अनुसार पर्व के दिन घर-घर में कई प्रकार के पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं. पूजा और व्रत के साथ परिवार के लोग एक-दूसरे के साथ पर्व की खुशियां साझा करते हैं. इससे गांवों में आपसी मेलजोल और सामुदायिक भावना भी मजबूत होती है.
लोकगीत और नृत्य से गुलजार हो रहे गांव
करमा-धरमा पर्व के दौरान शाम होते ही गांवों में लोकगीत और नृत्य का दौर शुरू हो जाता है. जावा के चारों ओर महिलाएं और युवतियां पारंपरिक गीत गाती हैं. सात दिनों तक चलने वाली इन गतिविधियों से गांवों का माहौल पूरी तरह उत्सवी हो जाता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि करमा-धरमा पर्व गांव की खुशहाली, अच्छी फसल और परिवार की समृद्धि की कामना से जुड़ा है. वहीं भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करने वाली इसकी परंपराएं इसे ग्रामीण समाज के प्रमुख लोकपर्वों में शामिल करती हैं.
