देश की आजादी की लड़ाई में बिहार के जमुई जिले का भी अहम योगदान रहा है. खैरा प्रखंड के खड़हुई गांव में स्वतंत्रता सेनानी रामगुलाम सिंह का घर कभी आजादी के दीवानों की सबसे सुरक्षित शरणस्थली हुआ करता था. बाहर से देखने पर यह एक साधारण ग्रामीण मकान लगता था, लेकिन इसके भीतर बने खुफिया कमरों में ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिलाने की रणनीति तैयार होती थी.
खुफिया कमरों में बनती थी थानों और पटरियों को उड़ाने की योजना
दिन ढलते ही रामगुलाम सिंह के घर में चहल-पहल बढ़ जाती थी. दोपहर और रात के समय यहां सैकड़ों क्रांतिकारियों के लिए भोजन पकता था. घर के भीतर जमीन के नीचे खुफिया कमरे (तहखाने) बने हुए थे. इन्हीं कमरों में देर रात तक बैठकें चलती थीं. आसपास के जंगलों से आए क्रांतिकारी यहां कचहरी-थानों पर हमला करने और रेल पटरियों को उखाड़ने की योजनाएं बनाते थे.
अंग्रेज अफसर ने पूछा नाम, तो मिला बेखौफ जवाब
रामगुलाम सिंह के पुत्र गोपाल शरण सिंह बताते हैं कि उनके पिता गांधी जी से काफी प्रभावित थे. वह महज 25 वर्ष की उम्र में ही स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े थे. जब पहली बार ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर उनका नाम पूछा, तो उन्होंने निडर होकर जवाब दिया- "मेरा नाम देशभक्त है और मेरे पिता का नाम भारतवर्ष है." यह जवाब उनके अदम्य साहस और ब्रिटिश सत्ता के प्रति खुले विद्रोह को दर्शाता था.
बेटी दुर्गा देवी भी थीं जांबाज, जंगल में पहुंचाती थीं भोजन
इस जंग में रामगुलाम सिंह अकेले नहीं थे. उनकी बेटी दुर्गा देवी भी अदम्य साहसी थीं. जब दोपहर में अंग्रेज सिपाहियों का पहरा सख्त होता, तब वह चुपचाप कोलजी जंगल की ओर निकल जाती थीं. जंगल में छिपे सेनानियों तक सुरक्षित भोजन पहुंचाना उन्हीं की जिम्मेदारी थी. रात होते ही वही सेनानी इस घर के खुफिया कमरों में पहुंचकर अगली रणनीति तय करते थे.
दर्जनों बार गए जेल, आज भी गवाही दे रहा खड़हुई का घर
रामगुलाम सिंह ने न सिर्फ दर्जनों बार जेल की यातनाएं सहीं, बल्कि कई बार अंग्रेजों की गोलियों का भी डटकर सामना किया. उन्होंने अपनी संपत्ति से भी आंदोलनकारियों की आर्थिक मदद की. खड़हुई गांव में उनका यह घर आज भी इतिहास की उस खामोश परत को समेटे हुए है. यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि उन अनगिनत गुमनाम नायकों की कहानी है, जिन्होंने हमारी आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया.
