भक्तों की आस्था का प्रतीक है तीनघरा वाली मां दुर्गा, इनके दरबार से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता

भक्तों की आस्था का प्रतीक है तीनघरा वाली मां दुर्गा.

जयकुमार शुक्ला, चकाई

भक्तों की आस्था का प्रतीक है तीनघरा वाली मां दुर्गा. प्रखंड क्षेत्र के तीनघरा गांव में अवस्थित चैती दुर्गा मंदिर में कामना लेकर आने वाले भक्तों की कामना मां अवश्य पूरी करती है. आज तक इनके दरबार से कोई खाली हाथ नही लौटा है. इस कारण इस प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में भक्तों की भीड़ सालों भर लगी रहती है.

मंदिर का इतिहास :

तीनघरा दुर्गा मंदिर के सयोजक सह अहलाद पांडेय के वंशज 80 वर्षीय गोकुल पांडेय बताते हैं कि करीब 200 वर्ष पूर्व निर्मित इस दुर्गा मंदिर में भक्तों की असीम आस्था है. उन्होंने आगे बताया कि उनके पूर्वज व वहां के तत्कालीन जमींदार अहलाद पांडेय को कोई संतान नहीं था. संतान प्राप्ति की लालसा में उन्होंने तीन-तीन विवाह किये, मगर उन्हें एक भी संतान नही हुआ. थक हारकर अपने कुल पुरोहित के परामर्श पर उन्होंने अपने कुलदेवी खडक वाहिनी मां दुर्गा की पूजा-आराधना क़र मन्नत मांगी कि अगर उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई तो वे तीनघरा गांव में मां दुर्गा मंदिर का निर्माण करा क़र वासंतिक नवरात्र के पावन अवसर पर मंदिर में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित क़र पूजा-अर्चना करेंगे. मां खडकवाहिनी दुर्गा मां की कृपा से उन्हें दो पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. वहीं वचन के अनुसार, उन्होंने मनोकामना पूरी होने पर तीनघरा गांव में मां दुर्गा के मंदिर का निर्माण कराक़र वासंतिक नवरात्र के मौके पर अपने पुरोहित पंडित महादेव भट्टाचार्य से मंदिर में स्थापित मां दुर्गा की प्राण प्रतिष्ठा कराकर नवरात्र की पूजा आरंभ की जो आज भी जारी है. वर्तमान में भी महादेव भट्टाचार्य के वंशज पंडित सुनील भट्टाचार्य इस दुर्गा मंदिर के पुजारी हैं.

नवरात्र के मौके पर मंदिर परिसर में लगता है तीन दिवसीय मेला

वासंतिक नवरात्र के अवसर पर महाअस्टमी, नवमी व विजय दशमी को मां चैती दुर्गा के दर्शन व पूजा-अर्चना करने हेतु बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है. वहीं मन्नत पूरा होने की खुशी में श्रद्धालु मां के मंदिर प्रांगण में महाअष्टमी व नवमी को सैकड़ों बकरे की बलि प्रदान करते हैं. वहीं मंदिर प्रांगण में महाअष्टमी, नवमी व विजयादशमी को भव्य मेला लगता है इसमें श्रद्धालुओं के मनोरंजन हेतु तारामाची, कठघोड़वा, कठपुतली नृत्य आदि का आयोजन होता है. जिसका श्रद्धालु जमक़र लुत्फ उठाते हैं, वहीं मेले में बिकने वाली लजीज मिठाइयों का भी आनंद उठाते हैं.

दान से मिली जमीन से होता है मंदिर का रखरखाव

मंदिर के संयोजक बताते हैं कि उनके पूर्वज जमींदार अहलाद पांडेय ने मां दुर्गा मंदिर निर्माण के साथ-साथ मंदिर में होने वाले पूजा अर्चना, आवश्यक खर्च व रखरखाव के लिए 32 एकड़ 36 डिसमिल जमीन मंदिर के नाम दान क़र दी थी. उसी जमीन में होने वाले फसलों को बेचकर उससे होने वाले आय से आज भी दुर्गा पूजा समिति द्वारा मंदिर पर होने वाले खर्च को पूरा किया जाता है.

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By PANKAJ KUMAR SINGH

PANKAJ KUMAR SINGH is a contributor at Prabhat Khabar.

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