80वें स्वतंत्रता दिवस पर याद किए गए प्रखंड के 3 वीर सपूत, जानिए आजादी के दीवानों की शौर्य गाथा

80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जमुई जिले के सोनो प्रखंड ने देश के तीन महान स्वतंत्रता सेनानियों - बंधु महतो, यमुना सिंह और श्रीकिरण को श्रद्धापूर्वक याद किया. जानिए, कैसे इन वीरों ने अपनी लेखनी, साहस और त्याग से आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

जमुई जिले के सोनो प्रखंड में 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश को आजाद कराने वाले अमर बलिदानियों को नमन किया गया. 15 अगस्त 1947 की स्वर्णिम सुबह तक पहुंचने के लिए देश के लाखों वीर सपूतों ने फांसी के फंदे को चूमा और अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. आजादी की इस महान लड़ाई में सोनो प्रखंड के वीर सपूतों का योगदान भी इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर प्रखंडवासी महान स्वतंत्रता सेनानी स्व. बंधु महतो, स्व. यमुना सिंह और स्व. श्रीकिरण के अदम्य साहस और त्याग को श्रद्धापूर्वक याद कर रहे हैं.

भारत छोड़ो आंदोलन में जेल गए थे बंधु महतो और पत्नी जीरा देवी

बेलंबा पंचायत के केंदुआलेबाड गांव निवासी स्व. बंधु महतो ने देश की आजादी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था. इस महासंग्राम में वे अकेले नहीं थे, बल्कि उनकी धर्मपत्नी जीरा देवी ने भी उनके कंधे से कंधा मिलाकर सार्थक भूमिका निभाई थी.

वर्ष 1942 के ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान बंधु महतो और जीरा देवी दोनों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की और जेल की काल कोठरी में जीवन व्यतीत किया.

आज भी उनके सम्मान में सरधोडीह चौक और केंदुआलेबाड गांव में स्व. बंधु महतो की प्रतिमा स्थापित है. इसके साथ ही प्रखंड कार्यालय परिसर में उनका भव्य स्मारक बना हुआ है, जहां हर वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को प्रखंडवासी उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं.

नेहरू के करीबी थे विद्वान सेनानी कुमार जमुना सिंह

सोनो प्रखंड के केशोफरका पंचायत स्थित घुटवे गांव के रहने वाले कुमार जमुना सिंह का नाम भी महान स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में बड़े आदर के साथ लिया जाता है. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने भी सक्रिय रूप से भाग लिया था और उन्हें जेल की सजा काटनी पड़ी थी.

कुमार जमुना सिंह न केवल एक निडर सेनानी थे, बल्कि वे अंग्रेजी भाषा के प्रकांड विद्वान भी माने जाते थे. उनके द्वारा लिखे गए बेहतरीन आलेख उस दौर में दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के अखबारों में प्रमुखता से छपा करते थे.

उनकी विद्वता और व्यक्तित्व से देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू काफी प्रभावित थे. बताया जाता है कि एक बार कुमार जमुना सिंह द्वारा कोट मांगे जाने पर पंडित नेहरू ने खुशी-खुशी अपना कोट उन्हें भेंट कर दिया था. पंडित नेहरू का वह ऐतिहासिक कोट आज भी जमुना सिंह के परिवार के पास एक धरोहर के रूप में सुरक्षित है.

लेखनी से आजादी की अलख जगाने वाले क्रांतिकारी श्रीकिरण

आजादी के उस उथल-पुथल भरे दौर में सोनो प्रखंड में एक और क्रांतिकारी नायक स्व. श्रीकिरण का उदय हुआ था. उन्होंने अपनी लेखनी और विचारों को ही अंग्रेजों के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बनाया.

श्रीकिरण ने एक पत्रकार, एक ओजस्वी कवि और एक प्रखर साहित्यकार के रूप में स्वतंत्रता संग्राम में अपना अमूल्य योगदान दिया. उनकी धारदार कविताओं और लेखों ने स्थानीय लोगों के दिलों में आजादी की आग धधका दी थी.

उनके द्वारा रचित कई कविता संग्रह आज भी जब लोग पढ़ते हैं, तो उनके भीतर राष्ट्रप्रेम का ज्वार उठने लगता है. उन्होंने अपनी कलम से सोनो की जनता में जो जोश भरा, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता.

बदहाली और गुमनामी में जी रहे हैं सेनानियों के परिवार

देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने वाले इन अमर सपूतों को आज हम 80वें स्वतंत्रता दिवस पर याद तो कर रहे हैं, लेकिन वर्तमान सच्चाई बेहद कड़वी है.

इन महान स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों की आर्थिक और सामाजिक दशा आज काफी कमजोर है. देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले इन परिवारों को जो सम्मान और सुविधाएं मिलनी चाहिए थीं, वे आज भी उनसे कोसों दूर हैं.

भले ही व्यवस्था ने इन परिवारों को हाशिए पर धकेल दिया हो, लेकिन सोनो प्रखंडवासी आजादी के लिए संघर्ष करने वाले इन महान देश प्रेमियों के त्याग को कभी नहीं भूल सकते.


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लेखक के बारे में

By विनय कुमार मिश्रा

विनय कुमार मिश्रा प्रिंट माध्यम में 20 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सोनो (जमुई) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, अपराध, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.

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