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श्रीविष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति ने जतायी नाराजगी, कहा सनातन धर्म के खिलाफ है ई-पिंडदान

By Prabhat Khabar Print Desk
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पिंडदान
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गया : गया धाम में श्राद्ध की शास्त्रोक्त विधियां हैं. वेदियों व प्रमुख दार्शनिक स्थलों पर सशरीर कर्म एवं दर्शन करने की देश में सनातन धर्म परंपरा है. हिंदू संस्कृति, धार्मिक ग्रंथों व पुराणों में श्राद्ध कर्म का फल पितरों को तब तक नहीं प्राप्त होता है, जब तक उनके पुत्र व अन्य परिवार स्वयं आकर गयाजी में श्राद्ध कर्म व पिंडदान का कर्मकांड संपन्न नहीं कर लेते हैं. लेकिन, कुछ एजेंसियां व कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए ऑनलाइन ई-पिंडदान को बढ़ावा दे रहे हैं, जो धार्मिक मान्यताओं के बिल्कुल विपरीत है.

ये बातें चांद चौरा स्थित सिजुआर भवन में श्रीविष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के द्वारा आयोजित प्रेसवार्ता में समिति के सचिव गजाधर लाल पाठक ने कहीं. उन्होंने बताया कि शास्त्रों में भी वर्णित है कि देश के अन्य सभी तीर्थों में गया तीर्थ व फल्गु तीर्थ सबसे श्रेष्ठ है. गयाजी में श्राद्ध कर्म व पिंडदान करने के बाद तीर्थ पुरोहितों को भोजन कराना शास्त्रोक्त पद्धति है. यह कर्मकांड सशरीर कराने पर पितरों को मुक्ति मिल पाती है.

पितृमुक्ति के लिए सशरीर आने की परंपरा राजन सिजुआर ने कहा कि पुराणों में वर्णित है कि जब पुत्र गया जाये, तो उसे ब्राह्मणों को ही आमंत्रित करना चाहिये. जब ब्राह्मण संतुष्ट होते हैं, तभी देवों के साथ-साथ पितर लोगों को भी संतुष्टि मिलती है. किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा अथवा ऑनलाइन ई-पिंडदान के द्वारा पिंडदान कराना मिथ्या, भ्रामक व अधार्मिक कृत्य है. इससे न तो श्राद्ध कर्म करने वालों को और न ही उनके पितरों को कोई फल प्राप्त होगा. उन्होंने गया श्राद्ध में श्रीविष्णुपद की महत्ता पर जानकारी देते हुए बताया कि गया धाम महान पवित्र तीर्थ है.

इस पितृ तीर्थ की संपूर्ण महत्ता विष्णुपद पर आधारित है. विष्णुपद ही सभी पितरों की मुक्ति का पावन तीर्थ है. शास्त्रीय मान्यता स्पष्ट है कि भगवान विष्णु ही हर बंधन से मुक्ति प्रदान करते हैं. गया धाम में पितरों की मुक्ति के लिए सशरीर आने की न केवल धार्मिक, आध्यात्मिक व पौराणिक मान्यता है, बल्कि यह सनातन परंपरा भी है. महेश गुप्त ने कहा कि पर्यटन विभाग ने पिछले करीब सात वर्षों से ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था शुरू की है, जिसका विरोध समिति द्वारा तब से किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा भी ऑनलाइन दर्शन व कर्मकांड करने की मान्यता नहीं दी गयी है. उन्होंने बताया कि पूरे देश में गया तीर्थ ही एक ऐसा तीर्थ स्थल है, जहां श्राद्ध कर्म का कर्मकांड करने आये श्रद्धालु अपने माता-पिता का जयघोष करते हैं. उन्होंने कहा कि ऑनलाइन पिंडदान की शुरू की जा रही परंपरा सनातन धर्म को नष्ट करने की साजिश रची जा रही है, जिसे समिति व पंडा समाज के लोग कभी सफल नहीं होने देंगे.

शंभु लाल विट्ठल ने कहा कि ऑनलाइन पिंडदान शुरू कराने वालों के विरुद्ध न केवल कानूनी कार्रवाई करायी जायेगी, बल्कि ऐसे लोगों पर प्राथमिकी भी दर्ज करायी जायेगी. पौराणिक व धार्मिक मान्यताओं को किसी भी सूरत में नष्ट नहीं होने दिया जायेगा. इस मौके पर विनोद मेहरवार, शिव कुमार भइया, महेश लाल गायब, गदाधर लाल कटरियार सहित गया पाल तीर्थ वृति सुधारिणी सभा व समिति से जुड़े अन्य लोग भी मौजूद थे.

posted by ashish jha

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