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प्रभात खबर के गया संस्करण का 10वें वर्ष में प्रवेश: सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता का सफर

By आशुतोष चतुर्वेदी
Updated Date
गया संस्करण की 9वीं वर्षगांठ
गया संस्करण की 9वीं वर्षगांठ
प्रभात खबर

आशुतोष चतुर्वेदी, प्रधान संपादक

अपने सुधी पाठकों के साथ यह बात साझा करते हुए बेहद प्रसन्नता हो रही है कि आप सभी के स्नेह और विश्वास के बल पर प्रभात खबर का गया संस्करण आज अपना 9वां साल पूरा कर 10वें वर्ष में प्रवेश कर गया. यह यात्रा सिर्फ आपके स्नेह व भरोसे के कारण संभव हो पायी है. प्रभात खबर के गया संस्करण की शुरुआत 21 अक्तूबर, 2011 को हुई थी. यह वह दौर था, जब बिहार के गांव-कस्बों में बदलाव की शुरुआत हुई थी.

इसके पहले इस इलाके में पटना से प्रकाशित समाचार पत्र आते थे. गया संस्करण शुरू करने का उद्देश्य पाठकों तक देश-दुनिया, राज्य की राजनीति, खेल, कला-संस्कृति और अन्य घटनाओं की नवीनतम व तथ्यात्मक खबरें पहुंचाना था. इसके साथ ही सुदूर इलाकों में बदलाव की आहट को स्वर देना और आसपास की खबरों से पाठकों को अपडेट भी करना था. हमें यह कहते हुए अपार हर्ष हो रहा कि गया संस्करण से जुड़े पांचों जिलों- कैमूर, रोहतास, औरंगाबाद, नवादा व गया के हर तबके के पाठकों ने हम पर भरोसा किया.

नौ वर्षों की यात्रा में प्रभात खबर ने सनसनी फैलाने वाली खबरों की प्रतिस्पर्धा के बजाय ऐसे सामाजिक मुद्दों को बहस के केंद्र में लाया, जो अब तक मीडिया से अछूते थे. ऐसी खबरों को तरजीह दी, जो सामाजिक बदलाव का वाहक बने. साथ ही समय-समय पर गवर्नेंस की भी पड़ताल की. सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के तहत प्रभात खबर ने माउंटेनमैन दशरथ मांझी की कहानी सबके सामने रखी थी.

इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए व समाज के हर वर्ग की आवाज को बल देते हुए हमने लौंगी भुइंया की जीवटता की कहानी को प्रमुखता से प्रकाशित किया. गया जिला मुख्यालय से 90 किलोमीटर दूर बांकेबाजार प्रखंड की लुटुआ पंचायत के रहनेवाले 70 वर्षीय लौंगी ने अपने जज्बे की बदौलत सूखे खेतों में पानी लाने के लिए 30 वर्षों में पांच हजार फुट लंबी पइन की खुदाई कर डाली. खबर का असर यह हुआ कि सरकारी व निजी संस्थानों की ओर से उन्हें सुविधाएं दी गयीं और सम्मानित भी किया गया.

इतना ही नहीं, समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाने की बात हो या फिर विकास को गति देने का सवाल, हर मसले पर प्रभात खबर मुखर रहा है. हमने अश्लील गानों के विरोध में अभियान चला कर सुसंस्कृत समाज बनाने की दिशा में लोक पत्रकारिता धर्म का निर्वहन किया. इस अभियान को खासकर, महिलाओं व छात्राओं ने काफी सराहा. वहीं, धार्मिक पर्यटन के लिए विश्व में प्रसिद्ध गया की फल्गु नदी की दुर्दशा पर रिपोर्ट प्रकाशित कर सरकार का ध्यान दिलाया. इसका असर भी हुआ.

अतिक्रमण रोकने के साथ-साथ फल्गु नदी को स्वच्छ करने की योजना को गति भी मिली. कहने का अभिप्राय यह कि प्रभात खबर सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता करता रहा है और यही इसकी पहचान व पूंजी भी है. हमें गर्व है कि बिहार- झारखंड की माटी-पानी का यह अखबार तीन-तीन राष्ट्रीय अखबारों की चुनौती के बावजूद निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है. मौजूदा दौर में जब सोशल मीडिया के जरिये अनियंत्रित सूचनाओं का प्रवाह हो, तब भरोसे की सूचना पाठकों तक पहुंचाने की हम हरसंभव कोशिश करते हैं.

कोरोना काल के दौरान न सिर्फ हमने पाठकों की सुरक्षा का ध्यान रखा है, बल्कि अखबार के वितरक बंधुओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए राहत सामग्री का वितरण भी कराया. प्रभात खबर की 9वीं वर्षगांठ के शुभ अवसर हम विज्ञापनदाताओं, अखबार के वितरक बंधुओं, अपनी टीम के तमाम साथियों और पाठकों के प्रति शुक्रिया अदा करना चाहते हैं, क्योंकि आपके सहयोग व समर्थन के बगैर हम यह सफर तय नहीं कर पाते.

Posted by: Ashish Jha

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