गया : क्या सी-सेक्शन (सिजेरियन) प्रसव प्राइवेट अस्पतालों के लिए गर्भवती के परिवार से पैसे उगाही करने का साधन बना गया है? यह सवाल समाज के लगभग हर तबके के मन में आज की तारीख में है. लोगों की इस शंका को कुछ सर्वे रिपोर्ट सही बताते हैं. कई लोगों के कड़वे अनुभव भी इस बात को सही बताते हैं कि प्राइवेट अस्पतालों में जान का डर दिखा कर सी-सेक्शन प्रसव कराया जाता है.
इसके एवज में उनसे मोटी रकम वसूल की जाती है. शहर में लोगों से बात करने के बाद ऐसे कई उदाहरण सामने आये जब प्राइवेट नर्सिंग होम में सी-सेक्शन प्रसव कराने व मोटी रकम जमा करने को कहा गया और उसी गर्भवती का सरकारी अस्पताल में सामान्य प्रसव हुआ. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट भी बताती है कि जिले में प्राइवेट अस्पतालों में 39.8% सी- सेक्शन प्रसव कराये जाते हैं जबकि सरकारी अस्पतालों में सिर्फ 2.9% है. राज्य में यह आंकड़ा दस सालों में बढ़ कर 17.2% से 31.0% पर पहुंच गया है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल बिहार में प्राइवेट अस्पतालों में सी-सेक्शन प्रसव पर कुल 800 करोड़ रुपये सालाना खर्च किये जाते हैं. सवाल यह है कि इस विषय पर हर कोई खामोश क्याें है. प्रशासनिक तंत्र से लेकर चिकित्सक संघों तक कोई भी इस विषय पर बात नहीं करना चाहता है. प्रशासनिक महकमा शिकायत मिलने पर कार्रवाई करने की बात कह अपना पल्ला झाड़ लेता है. चिकित्सक संघ के सदस्य तो बोलेंगे ही नहीं, क्योंकि उनमें आधे से अधिक के तो खुद के ही नर्सिंग होम हैं ऐसे में अपनी ही कारगुजारियों पर क्या कहें. सामान्य लोगों को तो वैसे भी फर्क नहीं पड़ता, वह अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की उलझनों की दुहाई देते हुए चुप हो जाते हैं.
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट में सी- सेक्शन आॅपरेशन को लेकर राज्य की जो स्थिति बतायी गयी है, वह बहुत कुछ बताती है : इस रिपोर्ट के मुताबिक 2005-06 में जो सर्वे कराया गया उसमें बिहार में प्राइवेट स्वास्थ्य संस्थानों में 17.2% सी- सेक्शन आॅपरेशन से प्रसव हुए . 2015-16 में जब फिर से सर्वे कराया गया तो यह आंकड़ा सीधे 31.0 % पर पहुंच गया.
यह बताता है कि दस सालों में प्राइवेट संस्थानों में सी-सेक्शन आॅपरेशन कितनी तेजी से बढ़ा है. दूसरी ओर सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में सी- सेक्शन आॅपरेशन दस सालों में बहुत घटा. निश्चित तौर पर सरकार के स्तर पर सी-सेक्शन आॅपरेशन को कंट्रोल करने का ही यह नतीजा था. 2005-06 सर्वे के मुताबिक राज्य में 7.6% सी सेक्शन आॅपरेशन हुआ जबकि 2015-16% में यह घट कर 2.6 % हो गया.
जिले में प्राइवेट अस्पतालों में 39.8% सिजेरियन आॅपरेशन सरकारी अस्पतालों में यह आंकड़ा अब तक सिर्फ 2.9%
गर्भवती की जान को खतरा बता कर डराया जाता
रामपुर इलाके के रहने वाले जितेंद्र कुमार कहते हैं कि सी-सेक्शन प्रसव कर प्राइवेट नर्सिंग होमवाले लोगों से केवल पैसा उगाही करते हैं. प्राइवेट अस्पतालों में प्रसव के लिए पहुंची महिलाओं व उनके परिवारों को इस कदर डरा दिया जाता है कि वह डाॅक्टर की बातों में आ जाते हैं. यूटरस में पानी का सूख जाना, गर्भाशय में बच्चे का कम मूवमेंट जैसे कारण गिना दिये जाते हैं.
अब ऐसे में परिवार वाले फंस जाते हैं. श्री कुमार कहते हैं कि वही डाॅक्टर जो अपने नर्सिंग होम में सी-सेक्शन की बात करते हैं वह सरकारी अस्पताल में सामान्य प्रसव कराते हैं. जितेंद्र कुमार बेहद गुस्से में कहते हैं कि जानवरों का तो सी-सेक्शन प्रसव नहीं होता. गाय का बछड़ा तो ऊंचाई से गिरने के बाद भी जिंदा ही रहता है तो फिर सभी मुश्किलें इंसानों में ही क्यों दिखती है, इसका एक मात्र कारण है पैसा. इंसान के लिए लोग पैसा खर्च करने को तैयार रहते हैं और डाॅक्टर को भी यह बात पता है.
आर्थिक लाभ ही है मुख्य उद्देश्य
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2010 में भारत समेत नौ देशों 1,10,000 बच्चों के जन्म पर शोध किया. इस शोध के बाद यह सामने आया कि 60 प्रतिशत बच्चों का जन्म सी-सेक्शन प्रसव से हुआ. और यह आॅपरेशन केवल पैसों के लिए कराया गया जबकि इसकी की कोई जरूरत नहीं थी. विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय मानकों के मुताबिक भारत में सरकारी और गैर सरकारी नर्सिंग होम में होनेवाले कुल प्रसव में केवल 10-15 % ही मामले सी-सेक्शन के हो सकते हैं. हालांकि इस मानक को कई स्त्री रोग विशेषज्ञ अस्वीकार करते हैं.
द लांसेट कमिशन के शोध के मुताबिक महिला व उसके परिवार के पास जानकारी का अभाव ही सी-सेक्शन प्रसव का सबसे बड़ा कारण है. उन्हें गर्भावस्था को लेकर कोई जानकारी होती नहीं, वह पूर्ण रूप से अपने चिकित्सक के भरोसे होती हैं. द लांसेट के ही मुताबिक सी-सेक्शन प्रसव में महिला के स्वास्थ्य को भी अधिक खतरा होता है. प्रसव पीड़ा के दौरान सामान्य प्रसव करानेवाली महिलाओं की तुलना में सी-सेक्शन कराने वाली महिलाओं को आइसीयू में भर्ती करने की संभावना 67 प्रतिशत अधिक होती है.
