दरभंगा. लोक आस्था का महापर्व छठ को लेकर बाजार सज गया है. खरीदारों से बाजार की रौनक बढ़ गयी है. त्योहार ने परंपरागत रोजी-रोजगार को जीवंत कर रखा है. खासकर सूप, कोनिया, दउरा जैसे परंपरागत रोजगार त्योहारी मौसम तक ही सीमित रह गये हैं. छठ में बांस से निर्मित सामानों का खास महत्व है. अमीर हो या गरीब, सभी बांस के बने सामानों की खरीदारी समय से पूर्व करते हैं. हालांकि बांस के दाम में हो रही बढ़ोतरी व आपूर्ति में कमी के कारण इससे बने सूप, दउरा, दुगरी, कोनिया, डलिया के दामों में काफी उछाल आ गया है. इससे व्रती परेशान हैं. स्टील व पीतल से निर्मित सूप, दउरा, डलिया, ढकिया, कोनिया व अन्य सामानों का प्रचलन होने से भी पारंपरिक बाजार प्रभावित हुआ है, परंतु छठ महापर्व में आज भी बांस के बर्तनों का कारोबार जीवंत है.
15 से 20 लाख की बिक्री के आसार
बांस के बने ढकिया, कोनिया आदि बेचने वाले चूनाभट्ठी अंबेडकर कॉलोनी निवासी किशोर मल्लिक बताते हैं कि गत 10 वर्षों से इस धंधे को कई अन्य जाति के लोगों ने भी अपनाया है. पहले त्योहार के बाद भी लोग बांस से बने सूप, दउरा व डगरा की खरीदारी करते थे, लेकिन अब तो पर्व ही इसके बिकने की आस रहती है. इसके कारण दुर्गा पूजा समाप्त होते ही पूरे परिवार संघ बांस के बरतने बनाने में दिन-रात जुट जाते हैं. वहीं केएम टैंक स्थित सड़क किनारे बांस से निर्मित सामान बेच रहे बेनीपुर निवासी अशोक सदा ने कहा कि बांस से निर्मित बरतन की बिक्री दुर्गा पूजा, दीपावली व छठ पर केवल जिला मुख्यालय में 15 से 20 लाख रुपए की होती है. इस धंधे में अन्य जाति के प्रवेश करने से महादलित समाज के सामने एक बड़ी चुनौती आ गयी है.
सौ से दो सौ के सूप एवं 150 से छह सौ रुपये तक दउरा
बाजार में छठ पर्व को लेकर सौ से लेकर दो सौ रुपए तक के बांस से बने सूप उपलब्ध है. वही छोटा दउरा 150 एवं बड़ा दउरा की कीमत छह सौ रुपये तक है. बाजार में पीतल और चांदी के भी सूप-दउरा उपलब्ध हैं. इसकी कीमत हजार से लेकर शुरू होकर म वजन के अनुसार तय की गयी है. ढकिया 350 से 15 सौ में उपलब्ध है.
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