चार वर्ष पहले भंडार में लगी आग में 19 लाख रुपये मूल्य के चादर जलने की बात आयी थी सामने
पुलिसिया जांच में महज कुछ पुराने चादर व कपड़ों के जलने की कही गयी थी बात
दरभंगा. डीएमसीएच के भंडार में करीब चार वर्ष पहले लगी आग मामले की जांच ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है. बता दें कि 25 जनवरी 2014 को नर्सिंग होम के भंडार में आग लग गयी थी.
आग लगने के बाद तत्कालीन भंडार पाल राकेश सिंह ने इसकी जानकारी बेंता ओपी पुलिस को दी. आवेदन में 19 लाख 79 हजार 500 रुपये का सतरंगी चादर जलने की बात कही गयी.
इसको लेकर 27 जनवरी 2014 को बेंता ओपी में सनहा 573/14 अंकित किया गया था. थानाध्यक्ष के आदेश पर मामले की जांच सअनि वालेश्वर सिंह ने की. अपने जांच रिपोर्ट में श्री सिंह ने स्पष्ट लिखा है कि किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा बीड़ी या सिगरेट पीकर फेंकने से अगलगी की घटना घटी. वहीं भंडार कक्ष के अवलोकन से खास क्षति नहीं होने की बात कही गयी.
साथ ही यह भी लिखा कि अग्निकांड में जले सभी पुराने कपड़े थे जिसमें कुछ बचा हुआ भी था. पुलिस की जांच रिपोर्ट आने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया कि अगलगी में 19 लाख 79 हजार रुपये के चादर तो नहीं जले. उस समय आशंका व्यक्त की गयी थी कि सतरंगी चादर घोटाला का पचाने के लिये भंडार में जानबूझकर आग लगायी गयी होगी.
इधर पुलिस की जांच रिपोर्ट आने के बाद तत्कालीन अधीक्षक ने भंडार पाल राकेश सिंह से जवाब-तलब किया था. पूछा था कि क्यों नहीं माना जाये की इसमें आपकी संलिप्तता है. अधीक्षक द्वारा पूछे गये स्पष्टीकरण में भंडार पाल ने जवाब दिया कि कमेटी गठन की इसकी जांच करायी जाये. इसके बाद न कमेटी गठित हुई.
न ही पुलिसिया जांच आगे बढ़ी. इस पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. सूत्रों की माने तो सतरंगी चादर के आपूर्तिकर्ता आदर्श बुनकर समिति पटना से जब पूछा गया तब समिति के प्रोपराइटर ने मौखिक रूप से बताया था कि उसने इतनी मात्रा में चादर की आपूर्ति ही नहीं की. इसका मतलब साफ था कि अस्पताल प्रशासन की मिलीभगत से ही सतरंगी चादर की खरीदारी में घोटाला हुआ था.
मरीजों को नहीं मिल रहा सतरंगी चादर योजना का लाभ
सरकार ने मरीजों को सुविधा देने के लिये कई योजना बनायी थी. इसी योजना के तहत प्रतिदिन बेड पर साफ चादर देने की व्यवस्था के तहत सरकार ने सतरंगी चादर योजना बनायी थी. योजना के शुरू होने के बाद कुछ दिनों तक मरीजों को दिन के हिसाब से रंग बदलकर चादर दिया जाता था.
इसके लिये डीएमसीएच में हरेक साल लाखों रुपये मूल्य के चादर की खरीदारी होती है. लेकिन, चादर खरीद में लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी मरीजों को अस्पताल में इस व्यवस्था का लाभ नहीं मिलता है. मरीज जब भी चादर की बाबत पूछते हैं तो उन्हें टका सा जवाब मिलता है चादर की कमी है. अगर डीएमसीएच कर्मियों की इसी बात को सच माने तो निश्चित रूप से प्रत्येक साल डीएमसीएच में चादर खरीद घोटाले से इनकार नहीं किया जा सकता है.
सोमवार को डीएमसीएच के सर्जरी वार्ड के डॉ जीएस कर्ण यूनिट का जायजा लेने पर मरीजों व उनके परिजनों ने बताया कि वे लोग जब से भर्ती हुये हैं चादर नहीं मिला है. पूछने पर बताया जाता है कि चादर की कमी है.
