दरभंगा : मिथिलांचल के प्रसिद्ध शेखर नेत्रालय एंड इएनटी हॉस्पीटल में पहली बार रविवार से कॉकलीयर इम्पलांट प्रोग्राम का शुभारंभ होगा. कॉकलीयर इम्पलांट प्रोग्राम के शुरू होने से अब यहां के जन्मजात मूक-बधिर बच्चों को इलाज के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं होगी.
उक्त जानकारी हॉस्पिटल के निदेशक व जाने-माने नेत्र सर्जन डॉ आशीष शेखर ने दी.
उन्होंने बताया कि विश्व के जाने माने कॉकलीयर इम्पलांट प्रोग्राम सर्जन डॉ आशीष के लहरी की मौजूदगी में इएनटी विशेषज्ञ डॉ अमित शेखर द्वारा दो से तीन बच्चों में कॉकलीयर इम्पलांट प्रोग्राम रविवार को नि:शुल्क किया जाएगा. उन्होंने कहा कि उनके पिता और शेखर नेत्रालय के संस्थापक डॉ राजशेखर श्रीवास्तव का यह सपना था कि लोगों को अपने घरों में ही राष्ट्रीय स्तर का स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराया जा सके. बड़े शहरों में ऑपरेशन के बाद रहकर स्पीच थेरेपी कराना महंगा होता है.
ऑपरेशन के तीन सप्ताह बाद सुनने लगता है मरीज : डॉ. अमित ने बताया कि सर्जरी के उपरांत यंत्र को तीन सप्ताह बाद स्विच ऑन किया जाता है. इसके बाद मरीज को आवाज सुनाई देने लग जाती है. इसके आगे की प्रक्रिया स्पीच थेरेपी और वॉइस रिहेबिलिटेशन के लिए प्रशिक्षित ऑडियोलॉजिस्ट और स्पीच थेरेपिस्ट की जरूरत होती है. शेखर नेत्रालय सारे अत्याधुनिक जांच के उपकरण एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की स्पीच थेरेपी और आवाज पुनर्वास की सुविधा उपलब्ध करा रही है. शेखर नेत्रालय के इएनटी विशेषज्ञ डॉ दीपाली शेखर भी मौजूद थी.
कॉकलीयर इम्पलांट फायदेमंद : इएनटी विशेषज्ञ डॉ अमित शेखर ने बताया कि हजार में तीन से चार बच्चे इस दुनिया में बहरेपन की समस्या के साथ जन्म लेते हैं. मगर अच्छी बात यह है कि सुनने की जो समस्या है उसका इलाज अब किसी भी उम्र में हो सकता है. लेकिन डेढ़ से तीन वर्ष के बाद कॉकलीयर इम्पलांट प्रोग्राम कराने से बच्चे के सुनने और बोलने की संभावना शत-प्रतिशत होती है. इसलिए चार वर्ष तक के बच्चों का कॉकलीयर इम्पलांट प्रोग्राम कराने का सबसे उत्तम समय होता है.
बताया कि दो से तीन साल की उम्र तक अभिभावक को पता चल जाता है कि बच्चा बिल्कुल बोल या सुन नहीं सकता है. इसके पीछे सबसे आम कारण सुनने के नस की क्षमता की कमी होती है. महानगरों में जाकर तो कॉकलीयर इम्पलांट करा लेते हैं लेकिन, उसके बाद जो छह महीने या उससे अधिक की जो प्रक्रिया स्पीच थेरेपी और आवाज पुनर्वास की होती है वह नहीं करा पाते हैं. इसके कारण बच्चे ऑपरेशन के बाद भी बोल एवं सुन नहीं पाते हैं.
