कोजागरा आज. नवविवाहित लड़कों के घर पर्व का विशेष आयोजन
कमतौल/दरभंगा : आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाले पर्व कोजागरा गुरुवार पांच अक्तूबर को मनाया जायेगा. इसकी तैयारी को लेकर बुधवार को बाजार में चहल-पहल रही. मिथिलांचल में कोजागरा पर्व काफी हर्ष और उल्लास से मनाया जाता है. कोजागरा के दिन रात भर जागने, धन की देवी मां लक्ष्मी एवं मां काली की पूजा करने तथा पान-मखान खाने और बांटने की परंपरा है.
जनश्रृति है कि इस रात आसमान से अमृत की बारिश होती है.
जिस परिवार में लड़के-लड़की की शादी वर्षभर के भीतर हुई होती है, वहां इस पर्व का विशेष रूप से आयोजन होता है. दुल्हे के चुमावन के लिए ससुराल से भार आता है. भार में कपड़ा, मिठाई के साथ-साथ पान-मखान और मछली भेजी जाती है. आमंत्रित रिश्तेदारों एवं समाज के लोगों के बीच पान-मखान और मिठाईयां बांटी जाती है. इस रात कौड़ी का खेल खेलने की भी परंपरा हैं. इसे पचीसी या चौपड़ कहा जाता है.
मिथिला में रात भर जगने की परंपरा, समाज में बांटा जाता पान व मखान
आज रात बढ़ जायेगी चांद की खूबसूरती: चांद तो यूं भी खूबसूरत होता है, परंतु इस रात चांद की खूबसूरती देखते बनती है. धवल चांदनी पूरी रात धरती को अलोकित करती रहती है. चांद से अमृत की वर्षा होती है. दुधिया प्रकाश में दमकते चांद से धरती पर जो रोशनी पड़ती है, उससे धरती का सौंदर्य निखरता उठता है. यह दृश्य देख देवता भी धरती पर आनंद की प्राप्ति हेतु चले आते हैं. मान्यता है कि जो भक्त रात में जागरण कर भजन कीर्तन करते हुए मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं, उन पर मां की कृपा बरसती रहती है. उनके यहां धन का आगमन और सुख संपति का वास होता है.
इस दिन अन्न-धन प्राप्ति के लिए लोग माता लक्ष्मी की पूजा और व्रत करते हैं. कई जगहों पर काली पूजा का आयोजन किया जाता है. आश्विन माह के पूर्णिमा की रात की अनुपम सुंदरता का उल्लेख देवी पुराण में मिलता है. संपूर्ण जगत की अधिष्ठात्री लक्ष्मी, इस रात कमल पर विराजमान होकर धरती पर विचरण करती है. देखती है कि कौन जाग रहा है और कौन सो रहा है. यही कारण है कि इसे को-जागृति यानी कोजागरा कहा गया है.
डॉ संजय कुमार चौधरी, आचार्य
