ब्रह्मपुर. मिट्टी की उर्वरा शक्ति बचाने और किसानों की आय दोगुनी करने के उद्देश्य से शुरू किया गया राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन ब्रह्मपुर प्रखंड में पूरी तरह पटरी से उतरा हुआ नजर आ रहा है. प्रखंड क्षेत्र के अधिकांश किसान इस योजना के लाभ और इसके उद्देश्यों से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं. विभागीय स्तर पर प्रचार-प्रसार की कमी और अधिकारियों की उदासीनता के कारण यह महत्वाकांक्षी योजना केवल कागजी आंकड़ों तक सिमट कर रह गयी है.
केवल कोरम पूरा करने में जुटा कृषि विभाग : आरोप है कि प्रखंड कृषि कार्यालय केवल लक्ष्य पूरा करने के लिए पुराने आंकड़ों का सहारा ले रहा है. सरकारी रजिस्टरों में तो क्लस्टर निर्माण और किसानों के चयन की बात कही जा रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि खेतों पर किसी भी प्रकार की प्राकृतिक खाद या जीवामृत का प्रयोग बड़े पैमाने पर शुरू नहीं हो सका है. विभाग के कर्मचारी फील्ड में जाने के बजाय कार्यालयों में बैठकर ही रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं, जिससे योजना की मंशा पर पानी फिर रहा है. प्राकृतिक खेती के लिए बीजामृत और घनजीवामृत तैयार करने की विधि सिखाने के लिए कोई व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं दिया गया. ब्रह्मपुर के किसानों को डर है कि यदि वे उत्पादन कर भी लें, तो उन्हें अपनी उपज का उचित दाम और बाजार कहां मिलेगा. प्रखंड कृषि पदाधिकारी और कृषि समन्वयकों के बीच तालमेल की कमी के कारण योजना आम किसान तक नहीं पहुंच पा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मपुर प्रखंड में अत्यधिक रसायनों के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता लगातार गिर रही है. ऐसे में प्राकृतिक खेती ही एकमात्र विकल्प है, लेकिन विभाग की खानापूर्ति वाली कार्यशैली इस बड़े बदलाव की राह में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है. स्थानीय किसानों ने मांग की है कि ब्रह्मपुर प्रखंड के प्रत्येक पंचायत में जागरूकता कार्यशाला आयोजित की जाये और प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को सीधे तौर पर प्रोत्साहन राशि और बाजार उपलब्ध कराया जाये.
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