उपेक्षा . बुलेट ट्रेन का सपना कैसे हो साकार, कोहरे में बढ़ जाती है हादसे की आशंका
ट्रैक का निरीक्षण करने में होती है ट्रैकमैन को परेशानी
बक्सर : देश में बुलेट ट्रेन का सफर शुरू कराने का सपना पूरा होने में काफी बाधाएं हैं, क्योंकि रेलवे ट्रैक की निगरानी करनेवाले ट्रैकमैन आज भी अंगरेजों के जमाने में बने लालटेन के सहारे हैं. जी हां! सफर के दौरान ट्रेन के डिब्बों में जब यात्री आराम से सो रहे होते हैं. तब उनमें से बहुतों को नहीं पता होता हैं कि लोगों को सुरक्षित रखने के लिए ट्रैकमैन कितनी कड़ी मेहनत करते हैं. ठंड हो या गरमी यहां तक कि खराब मौसम में भी ये ट्रैकमैन रेलवे ट्रैक पर अपनी ड्यूटी पर तैनात रहते हैं.
रेलवे विभाग ट्रैकों की देखभाल को तेजी से आधुनिक बना रहा है. वे दिन और रात में कम- से- कम एक बार ट्रैक के एक-एक इंच का निरीक्षण करते हैं. इसके बावजूद उन्हें आधुनिक लाइट मुहैया नहीं करायी गयी है. कड़कड़ाती ठंड हो या चिलचिलाती धूप, अंधेरी रात हो या घनघोर बरसात, रेलवे ट्रैक की सुरक्षा में लगे रहनेवालों के लिए आज भी लालटेन ही सहारा है. ऐसे में आपका सफर कितना सुरक्षित है यह कहना मुश्किल है.
रात्रि निरीक्षण में होती है कठिनाई
रेलवे ट्रैक की निगरानी में लगे अनिल और जुगेश्वर ने बताया कि लैंप केरोसिन से जलता है. विभाग इसके लिए केराेसिन की व्यवस्था तो करता है. लेकिन, केराेसिन से जलनेवाले लैंप अब कारगर नहीं हैं. लालटेन के सहारे ट्रैक देखने में परेशानी होती है.
कुहासे के दौरान तो कई बार दुर्घटना की आशंका भी बनी रहती है. रेलवे के अधिकारी भी मानते हैं कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कोई मायने नहीं रखता है. रेलवे ट्रैकमैन को नहीं हटा सकते.
इसके बावजूद ट्रेनों में सफर कर रहे हजारों यात्रियों की सुरक्षा को लेकर विभाग चिंतित नहीं है.
अधिक गरमी और बारिश के मौसम में हमें अधिक सतर्क रहना होता है, क्योंकि ऐसे मौसम में ट्रैक के क्षतिग्रस्त होने की आशंका ज्यादा होती है.
ट्रैकमैन के पास टॉर्च नहीं होने की जांच करायी जायेगी
ट्रैकमैन को दी जानेवाली लालटेन विशेष तरह की लालटेन होती है. जो आंधी-तूफान या बरसात के समय में भी बुझती नहीं है. उससे सिग्नल का काम भी होता है. हालांकि, ट्रैक के निरीक्षण के लिए टॉर्च भी दिये जाते हैं. किन परिस्थितियों में ट्रैकमैन के पास टॉर्च नहीं हैं. इसकी जांच करायी जायेगी.
रंजीत सिंह, डीआरएम पीआरओ, दानापुर डिवीजन
