अनदेखी. धन्वंतरि आयुर्वेद अस्पताल में नहीं हैं विशेषज्ञ चिकित्सक
उत्तर पश्चिम बिहार का इकलौता राजकीय धन्वंतरि आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय की स्थिति आज बद से बदतर है. यानी अस्पताल अब अपनी अंतिम सांस गिन रहा है. मान्यता नहीं मिलने के कारण कॉलेज 12 वर्षों से बंद है. कभी चिकित्सा के लिए 14 विभागों की सुविधा थी, पर आज ये विभाग भी धवस्त हैं. पूर्व में यहां केवल मरीजों का इलाज ही नहीं होता था, बल्कि कॉलेज में पढ़नेवाले छात्र औषधियों की खोज भी करते थे. पर आज यहां आउट डोर की सुविधा हीं बची है.
बक्सर : शहर से एक किलोमीटर दूर अहिरौली गांव में राजकीय श्री धन्वंतरि आयुर्वेद महाविद्यालयएवं चिकित्सालय है. इसकी स्थापना 1972 में हुई थी. तब यह शहर के कोइरपुरवा मुहल्ले में संचालित होता था. दलसागर के डॉ. सिद्धनाथ तिवारी और तत्कालीन मंत्री जगनारायण त्रिवेदी ने इसकी नींव रखी थी. इस कमेटी में इनके अलावे आरके उपाध्याय, केशव प्रसाद, बिंदेश्वरी चौबे और धर्मदेव पाठक भी शामिल थे. वर्ष 1980 में इसको अपनी जमीन उपलब्ध हुई और इसे अहिरौली गांव के बांध के समीप स्थापित किया गया. वर्ष 1986 में यह सरकारीकरण हुआ.
तब से यह आज तक यहीं कार्यरत है. उस समय इस कॉलेज और अस्पताल में कुल 203 कर्मी थे. कॉलेज में छात्र जहां आयुर्वेद की शिक्षा लेते थे, तो वहीं मरीजों का इलाज भी होता था. तब आउट डोर और इंडोर दोनों की सुविधा थी. हर दिन ओपीडी में तीन सौ से अधिक मरीज देखे जाते थे, पर आज अस्पताल अपने जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और केवल आउट डोर ही चलता है. बाहर से देखने पर बिल्कुल खंडहर की तरह दिखता है. 14 विभागों के भवन भी खंडर में तब्दील हो गये हैं.
नहीं हैं महिला डॉक्टर
कभी यहां इंडोर में सौ बेडों की व्यवस्था थी. मरीज भरती होते थे और उनका इलाज होता था, पर आज अस्पताल में इंडोर की व्यवस्था पूरी तरह बंद है. अस्पताल में नौ डॉक्टर हैं. इनमें से कोई भी विशेषज्ञ नहीं हैं.
सभी सामान्य फिजिसियन ही हैं. 13 कॉलेज में कार्यरत हैं, लेकिन अब कॉलेज का काम नहीं होने से ये भी अस्पताल के काम में हाथ बंटा रहे हैं. एक भी महिला डॉक्टर नहीं है और न ही नर्स. जबकि यहां सबसे ज्यादा इलाज के लिए महिला मरीज ही आती हैं, जिन्हें पुरुष डॉक्टर से ही अपना इलाज कराना पड़ता है.
हर दिन करीब 50 से अधिक मरीजों का इलाज आउट डोर में होता है. कंपाउंडर और दवा वितरण के लिए भी यहां कोई नहीं है. ऐसे में दवा वितरण का कार्य एक डॉक्टर के ही जिम्मे है. मरीज बताते हैं कि यहां असाध्य बीमारियों का इलाज आसानी से हो जाता है, लेकिन सरकार की उदासीनता के कारण यहां आज कुछ भी सुविधा नहीं है. भगवान भरोसे जैसे-तैसे अस्पताल चल रहा है.
2003 से बंद है कॉलेज
राज्य भर में चार आयुर्वेद कॉलेज हैं. इनमें से बक्सर, पटना, दरभंगा और बेगूसराय शामिल हैं. इसी वर्ष कर्मचारियों के चयन संबंधित मामला प्रकाश में आया था, जिसके बाद राज्य सरकार ने चिकित्सकों एवं कर्मचारियों की मात्र 22 संख्या को रखकर शेष को सेवा से बरखास्त कर दिया था. इस आघात से अभी विद्यालय ऊबर भी नहीं पाये थे कि वर्ष 2003 में ही भारतीय केंद्रीय चिकित्सा परिषद ने बक्सर के आयुर्वेदिक कॉलेज समेत राज्य के सभी कॉलेजों की मान्यता रद्द कर दी. यह मान्यता मानक पूरा नहीं करने की वजह से रद्द की गयी.
तब से केवल यहां चिकित्सा की सुविधा ही दी जाती है. फिलहाल पटना को कॉलेज का मान्यता मिल चुका है. कॉलेज सूत्रों की मानें, तो जब तक कॉलेज का भवन और कर्मचारियों की भरती नहीं होती, तब तक मान्यता नहीं मिलेगी. इसके लिए राज्य सरकार के पास बक्सर आयुर्वेद कॉलेज ने दस करोड़ का बजट बना कर भेजा है. वहीं, कॉलेज प्रशासन की मानें, तो बिहार के सभी कॉलेजों के लिए इस वित्तीय वर्ष में 70 से 80 करोड़ रुपये आये हैं, पर अभी तक आवंटन नहीं मिल पाया है.
क्या कहते हैं प्राचार्य
भवन के लिए दस करोड़ का बजट बनाया गया है. यदि सरकार बजट पास कर देती है और रिक्त पदों पर बहाली हो जाती है, तो कॉलेज पुन: चलने लगेगा. अस्पताल में जो सीमित व्यवस्थाएं हैं उनके अनुरूप कार्य किया जा रहा है. फिलहाल, राज्य के पांच कॉलेजों के लिए आवंटन आया है. आवंटन मिलते ही कॉलेज का काम शुरू होगा.
डॉ. तेज नारायण चौबे, प्राचार्य
