Nalanda News (कंचन कुमार): नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ सहित पूरे ग्रामीण इलाकों से इन दिनों आम जनजीवन और जनस्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करने वाली एक बेहद गंभीर खबर सामने आ रही है. पूरे जिले में इन दिनों बैटरी चालित आधुनिक लाउडस्पीकरों का उपयोग और दुरुपयोग बहुत तेजी से बढ़ गया है, जिसने आम नागरिकों की रातों की नींद और दिन का चैन पूरी तरह छीन लिया है. शहर के मुख्य रिहायशी इलाकों से लेकर सुदूर गांवों की संकरी गलियों तक फेरीवाले तेज आवाज में अपने सामानों का भोंपू बजाकर प्रचार कर रहे हैं. इस लगातार जारी रहने वाले कानफोड़ू शोर के कारण लोग भयंकर मानसिक तनाव, चिड़चिड़ेपन और कान संबंधी गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन इस महा-संकट पर पूरी तरह आंखें मूंदे बैठा है.
साइंस और साइलेंस जोन की उड़ीं धज्जियां, स्कूल और अस्पतालों के पास भी बज रहे लाउडस्पीकर
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और समाजसेवियों से मिली जानकारी के अनुसार, जिले में ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) रोकने के लिए सरकारी नियम तो बहुत हैं, लेकिन धरातल पर उनकी जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. सब्जी, फल, कपड़ा, बर्तन, कंबल और मछली बेचने वाले फेरीवाले अपनी साइकिल, मोटरसाइकिल और ई-रिक्शा पर भारी-भरकम लाउडस्पीकर बांधकर घूम रहे हैं. कई जगहों पर इन लाउडस्पीकरों के एम्पलीफायर की आवाज की तीव्रता इतनी डरावनी और अधिक होती है कि घरों के भीतर बैठे लोगों की पूरी दिनचर्या ठहर जाती है. इस अवांछित शोर का सबसे घातक और जानलेवा असर घर में मौजूद नवजात बच्चों, दिल के मरीजों और असहाय बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा निर्धारित नियमों को ताक पर रखकर जिले के बड़े सरकारी व निजी स्कूलों, छोटे बच्चों के आंगनबाड़ी केंद्रों और मुख्य स्वास्थ्य संस्थानों के आसपास (साइलेंस जोन) भी यह लाउडस्पीकर बिना किसी रोक-टोक के कान फाड़ते रहते हैं. इससे कक्षाओं में पढ़ाई कर रहे छात्रों की एकाग्रता टूट रही है और अस्पतालों के आईसीयू व सामान्य वार्डों में भर्ती गंभीर मरीजों की परेशानी कई गुना बढ़ गई है.
मानसिक शांति हो रही है पूरी तरह भंग, डॉक्टरों ने दी बहरेपन और डिप्रेशन की कड़ी चेतावनी
इस गंभीर समस्या पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक और हाई-डेसिबल (High Decibel) का शोर अगर लंबे समय तक इंसानी कानों के आसपास बना रहे, तो यह सीधे सेंट्रल नर्वस सिस्टम को डैमेज करता है. इससे लोगों में मानसिक तनाव, अनिद्रा (नींद न आना), ब्लड प्रेशर बढ़ना और स्वभाव में तीखा चिड़चिड़ापन जैसी मानसिक विकृतियां तेजी से जन्म ले रही हैं. जिले के जागरूक नागरिकों ने इसे अब केवल एक आम समस्या न मानकर सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक बेहद खतरनाक और गंभीर डिजिटल मुद्दा बताया है.
जागरूकता का घोर अभाव, समाजसेवी विकास कुमार उर्फ गांधी जी ने प्रशासन से की सीलिंग की मांग
स्थानीय लोगों का साफ आरोप है कि नालंदा जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा ध्वनि प्रदूषण के जानलेवा दुष्प्रभावों को लेकर न तो कोई जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है और न ही थानों की पुलिस इन गाड़ियों को रोककर उनका चालान काट रही है. नियमों की कोई जानकारी न होने और पुलिस का कोई डर न होने के कारण इन फेरीवालों की मनमानी दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है.
इस भयावह स्थिति को देखते हुए क्षेत्र के प्रमुख समाजसेवी विकास कुमार उर्फ गांधी जी, सीनियर बैंककर्मी विजय कुमार और वरिष्ठ शिक्षक टिंकू कुमार सहित दर्जनों प्रबुद्ध लोगों ने नालंदा के जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान से इस पर तुरंत एक विशेष टास्क फोर्स बनाकर ठोस कानूनी कार्रवाई करने की पुरजोर मांग की है. नागरिकों का दोटूक मानना है कि आवासीय क्षेत्रों में डेसिबल मीटर से नियमित जांच होनी चाहिए और जो भी लाउडस्पीकर तय मानकों से तेज बजते हुए पाए जाएं, उनकी गाड़ियों को ऑन-स्पॉट जब्त कर भारी जुर्माना ठोकना चाहिए. समय रहते अगर इन अवैध भोंपुओं पर लगाम नहीं कसी गई, तो शांत वातावरण वाले इलाके पूरी तरह नरक में तब्दील हो जाएंगे. इस आवाज के बाद अब देखना यह होगा कि क्या नालंदा का प्रशासनिक अमला जागता है या जनता ऐसे ही इस टॉर्चर को सहने के लिए मजबूर रहती है.
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