Nalanda News (बिहारशरीफ कार्यालय से कंचन कुमार की रिपोर्ट)
करीब 45 वर्षों से अपने भवन और जमीन के इंतजार में चल रहे बिहारशरीफ जिला संग्रहालय के लिए उम्मीद की नई किरण दिखाई दी है. जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी-सह-संग्रहालय की प्रभारी अध्यक्ष शालिनी प्रकाश के प्रयास से बिहारशरीफ-राजगीर मार्ग स्थित दीपनगर स्टेडियम के समीप लगभग दो एकड़ भूमि संग्रहालय निर्माण के लिए चिन्हित की गई है. राजगीर मलमास मेला समाप्त होने के बाद भूमि की मापी और सीमांकन की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है. सभी प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी होने पर संग्रहालय को पहली बार अपना स्थायी भवन मिल सकेगा.
1981 में हुई थी स्थापना, आज भी किराये के भवन में संचालित
बिहारशरीफ संग्रहालय की स्थापना वर्ष 1981 में जिले के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त पुरातात्विक मूर्तियों और कलावस्तुओं के संरक्षण के उद्देश्य से की गई थी. स्थापना के शुरुआती वर्षों में संग्रहालय में पर्यटकों और शोधार्थियों की अच्छी आवाजाही रहती थी. लेकिन समय के साथ प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह संग्रहालय अपने उद्देश्य से भटकता चला गया. वर्तमान में यह संग्रहालय इंडियन रेडक्रॉस सोसाइटी के भवन में किराये के आधार पर संचालित हो रहा है.
विश्वस्तरीय विरासत वाले जिले में संग्रहालय की बदहाल स्थिति
विश्व धरोहर नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष, राजगीर और प्राचीन बौद्ध स्थलों के कारण नालंदा की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है. यहां देश-विदेश से हजारों पर्यटक ऐतिहासिक धरोहरों को देखने आते हैं. इसके बावजूद जिला मुख्यालय का संग्रहालय आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है. संग्रहालय परिसर में दर्शकों के बैठने, पेयजल और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, जिससे पर्यटकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.
83 पुरावशेष सुरक्षित, 15 दुर्लभ मूर्तियां ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण
संग्रहालय में वर्तमान में 83 पुरातात्विक कलाकृतियां संरक्षित हैं, जिनमें 15 दुर्लभ मूर्तियां विशेष महत्व रखती हैं. इनमें अधिकांश मूर्तियां आठवीं से दसवीं शताब्दी तथा पालकालीन इतिहास से संबंधित हैं. पर्याप्त स्थान नहीं होने के कारण इन बहुमूल्य धरोहरों का व्यवस्थित प्रदर्शन नहीं हो पा रहा है. स्थिति यह है कि एक समय में एक दर्जन से अधिक दर्शकों के प्रवेश की भी समुचित व्यवस्था उपलब्ध नहीं है.
दो कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों के भरोसे चल रहा संग्रहालय
संग्रहालय की व्यवस्था फिलहाल बेहद सीमित संसाधनों के साथ संचालित हो रही है. यहां केवल दो चतुर्थवर्गीय कर्मी और कुछ सुरक्षाकर्मी तैनात हैं, जिनके भरोसे संग्रहालय की देखरेख हो रही है. स्थानीय स्तर पर नियमित अध्यक्ष की व्यवस्था भी नहीं है. प्रभारी अधिकारी को कई जिलों का दायित्व संभालना पड़ता है, जिससे संग्रहालय के विकास और संरक्षण कार्यों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा पा रहा है.
खुदाई में मिल रहीं प्राचीन मूर्तियां, संरक्षण की बड़ी चुनौती
जल-जीवन-हरियाली योजना के तहत नदियों, पइन, पोखरों और तालाबों की खुदाई के दौरान जिले के विभिन्न क्षेत्रों से लगातार प्राचीन मूर्तियां और कलाकृतियां मिल रही हैं. संग्रहालय में पर्याप्त स्थान नहीं होने के कारण कई मूर्तियां थानों, स्कूलों, प्रखंड कार्यालयों और गांवों के चौक-चौराहों पर रखी जा रही हैं. कई स्थानों पर ग्रामीण इन मूर्तियों की पूजा-अर्चना भी शुरू कर देते हैं, जिससे उनके वैज्ञानिक संरक्षण और ऐतिहासिक महत्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.
सात वर्षों से भूमि उपलब्ध कराने का चल रहा प्रयास
वर्ष 2001 में तत्कालीन जिलाधिकारी चंचल कुमार के प्रयास से रेडक्रॉस परिसर में विरासत भवन का निर्माण कराया गया था. इसके बाद संग्रहालय के लिए अलग भूमि उपलब्ध कराने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई. सात वर्ष पूर्व कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के तत्कालीन अपर सचिव दीपक आनंद ने भी संग्रहालय निर्माण के लिए भूमि चिन्हित करने का निर्देश दिया था. हाल ही में संग्रहालय निदेशालय ने पुनः जिला प्रशासन को पत्र भेजकर इस प्रक्रिया में तेजी लाने को कहा है.
पर्यटन और शोध गतिविधियों को मिलेगा बढ़ावा
दीपनगर स्टेडियम के समीप भूमि चिन्हित होने के बाद अब संग्रहालय को अपना भवन मिलने की उम्मीद मजबूत हुई है. नया भवन बनने से जिले की पुरातात्विक धरोहरों का बेहतर संरक्षण और प्रदर्शन संभव हो सकेगा. साथ ही शोधार्थियों, विद्यार्थियों और पर्यटकों को भी बेहतर सुविधाएं मिलेंगी. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बिहारशरीफ में पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी.
क्या कहते हैं अधिकारी
शालिनी प्रकाश, प्रभारी अध्यक्ष, बिहारशरीफ संग्रहालय ने बताया कि बिहारशरीफ-राजगीर मार्ग पर दीपनगर स्टेडियम के समीप लगभग दो एकड़ भूमि संग्रहालय निर्माण के लिए चिन्हित की गई है. राजगीर मलमास मेला समाप्त होने के बाद भूमि की मापी और सीमांकन कार्य शुरू किया जाएगा. इसके बाद अंचलाधिकारी से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त कर प्रस्ताव विभाग को भेजा जाएगा. विभागीय स्वीकृति मिलने के बाद संग्रहालय भवन निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी.
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