सांप्रदायिक सौहार्द का अद्भुत नजारा
मखदुम साहब के मजार पर प्रतिवर्ष तीन दिवसीय उर्स मेले का आयोजन होता है, जिसमें राज्य भर के श्रद्धालु पहुंच कर प्रसाद चढ़ाते हैं व चादरपोशी करते हैं. श्रद्धालुओं की भीड़ से मजार स्थल पर मेले जैसा नजारा उत्पन्न हो गया है.
बिहिया :बिहिया स्थित मखदुम साहब के मजार पर प्रतिवर्ष लगनेवाले तीन दिवसीय उर्स रविवार से प्रारंभ हो गया. दूसरे दिन शुक्रवार को मजार पर अपनी मन्नतें मांगने और चढ़ावा चढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी, जिससे मजार स्थल के आसपास मेला जैसा नजारा उत्पन्न हो गया है. कई अस्थायी दुकानें और झूला आदि के कारण मजार स्थल के पास रौनक फैल गयी है.
मजार स्थल पर पुलिस बल तैनाती : मजार स्थल के पास पुलिस बल की तैनाती की गयी है. पूर्व में हुई भगदड़, मारपीट व महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाओं के बाद कमेटी की मांग पर मजार स्थल पर मजिस्ट्रेट व पुलिस की तैनाती की गयी तथा प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल भी मुहैया कराया गया है.
मन्नतें मांगने व चढ़ावा चढ़ाने की श्रद्धालुओं में लगी है होड़
हिंदू-मुसलमान दोनों करते हैं चादरपोशी
मखदुम शेख सरफुद्दीन शाह अहिया मनेरी के नाम से मशहूर मखदुम साहब के मजार पर सांप्रदायिक सद्भावना का अद्भुत नजारा दिख रहा है. मजार पर हिंदू और मुसलमान दोनों ने प्रसाद चढ़ाया और चादरपोशी कर दुआ मांगी. उर्स के पहले दिन गुुरुवार से ही बंगाल, उतर प्रदेश और बिहार के विभिन्न जगहों से लोगों का आने का सिलसिला जारी हो गया. पूर्व मुखिया मुराद हुसैन ने बताया कि शुक्रवार को लगभग 20 हजार लोगों ने मजार पर माथा टेका और मन्नतें मांगी़
रोचक है मखदुम साहब की जीवनी
बिहिया के जंगलों में इबादत के दिनों में चुल्हाई यादव नामक एक चरवाहा वहां आया करता था. एक दिन चुल्हाई यादव को हजरत ने उसके गाय से दूध निकालने को कहा, तो चरवाहा ने कहा कि गाय अभी दूध देनेवाली नहीं है. हजरत ने उससे पुन: दूध निकालने का अनुरोध किया. इस पर चरवाहे ने झुंझलाते हुए दूध निकालना शुरू किया और दुध निकलने भी लगा. तब से चुल्हाई यादव हजरत का खादिम बन गया. इसी जगह पर हजरत साहब का मजार भी बना है और बगल में ही चुल्हाई खादिम का भी मजार है.
भौतिक बाधा से मुक्ति के लिए लगी रही होड़
मखदुम साहब के मजार पर भौतिक बाधा से मुक्ति के लिए पुरुष व महिलाओं में होड़ लगी रही. पुरुष मजार स्थल के पास रखे भारी-भरकम पत्थर को जहां उठा कर अपने को भौतिक बाधा से मुक्त मान रहे थे, वहीं महिलाएं भी मजार स्थल के समीप विभिन्न विधियों को अपना कर खुद को भौतिक बाधा से मुक्ति दिलाने के लिए प्रयास कर रही थीं. ऐसी मान्यता है कि मखदुम साहब के मजार पर आनेवाले श्रद्धालुओं को भौतिक बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है और मन्नतें पूरी होती हैं.
