आरा : धूप ,वर्षा और ठंड का परवाह किये बगैर देश का किसान पूरे वर्ष जी- तोड़ मेहनत करता है. अपने खेतों को ही अपनी कर्मभूमि तथा धर्म भूमि समझता है. फसलों के उत्पादन में दिन- रात एक कर देता है पर इतनी मेहनत के बाद भी उसे मिलता क्या है, यह समझने का विषय है. वर्तमान में किसानों की स्थिति को देखकर विद्वानों द्वारा बनायी गयी कविता उत्तम खेती, मध्यम बान, नीच चाकरी भीख निदान गलत साबित हो रही है. किसान फटेहाल है और दूसरे क्षेत्रों में काम करनेवाले लोग मालामाल हैं.
हालांकि अब सरकार किसानों के लिए तथा कृषि के लिए योजनाएं बना रही हैं पर सरकार के लाख प्रयास के बावजूद किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है. किसान दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर है. कृषि क्षेत्र में विकास की रफ्तार तेज नहीं हो पा रही है. कृषि क्षेत्र आज भी उपेक्षा की शिकार है. किसानों की माली हालत सुधरने की जगह खराब होती जा रही है. सरकार भले ही कृषि क्षेत्र में विकास और किसानों की माली हालत सुधारने के लिए तरह-तरह के उपाय कर रही है. योजनाएं बना रही हैं. योजनाएं जमीन स्तर तक पहुंचे और उसका लाभ किसानों को सीधे मिल सके, पर सरकार में बैठे लोगों की उदासीनता या कर्तव्यहीनता तथा समाज में फैले उनके एजेंटों के कारण योजनाओं का लाभ किसानों को नहीं मिल पा रहा है. अधिसंख्य किसान लाभ के लिए वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर लगाते रह जाते हैं और अंततः निराश होकर बैठ जाते हैं. सरकार की योजनाओं का लाभ उन्हें नहीं मिल पाता है. बिचौलिये हमेशा सरकार पर भारी पड़ते हैं और सरकार के हर उस उपाय का काट निकाल लेते हैं और अपना खेल खेलते रहते हैं. इसमें किसानों की अशिक्षा और योजनाओं की उचित जानकारी नहीं होना भी बिचौलियों के काम को आसान बना देता है.
स्थितियां ऐसी बनायी जाती हैं कि बेचारा किसान उसमें पीस कर रह जाता है और अपनी बेचारगी से बाहर नहीं निकल पाता है. सरकार बार-बार निरीक्षण और परीक्षण के लिए कर्मियों की नियुक्ति करती है. पर घर का रखवाला ही घर उजाड़नेवाला बन जाता है. सरकार के प्रचार और कागजों में खाद, बीज, पटवन तथा कृषि यंत्र सहित अन्य सुविधाएं किसानों को मिलती रहती हैं. इतनी सुविधाओं के बाद भी किसान की स्थिति दयनीय क्यों है. इस पर विचार करने की आवश्यकता है. प्रभात खबर द्वारा अगिआंव प्रखंड के वरुणा पंचायत के वरुणा गांव में किसान चौपाल का आयोजन किया गया. इस अवसर पर काफी किसान इकट्ठा हो गये तथा किसानों ने खुल कर अपनी बात रखी. वहीं चौपाल में किसानों के दर्द भी छलके.
बिछाया जाये नहर का जाल, पुराने का हो आधुनिकीकरण
जिले में नहर का जाल बिछाया जाना चाहिए.क्योंकि सिंचाई के प्रमुख संसाधन नहर हैं, पर अब तक उनका आधुनिकीकरण नहीं हो पाया. वर्षों पहले आरा- डिहरी मेन केनाल के साथ इससे जुड़ी नहर की कई शाखाएं कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी के लिए स्थापित की गयी. फिर भी जिले के नहरवाले क्षेत्रों में भी किसानों को सिंचाई में परेशानी होती है. नहरों की हालत ठीक नहीं है. कई जगहों पर टूट गयी है. इस कारण अनावश्यक पानी की बर्बादी हो रही है. पानी बर्बाद होने से नहर के अंतिम छोर तक पानी नहीं जा पाता है. इससे किसानों को सिंचाई में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है. अंतिम छोर तक पानी नहीं पहुंचने के कारण उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है. वहीं सुविधाजनक तरीके से नहर के पानी जिन क्षेत्रों में पहुंचता है, वहां नहर टूटने से पानी के कारण फसल क्षति पहुंचती है.
राशि जोड़कर उत्पादन की तीन गुनी अधिक तय हो कीमत
किसानों की लागत की राशि को जोड़कर उससे तीन गुना अधिक कीमत सरकार समर्थन मूल्य के रूप में निर्धारित करें अन्यथा किसान चौपाल में किसानों ने कहा कि हमें अपने उत्पादन की कीमत तय करने का अधिकार मिलना चाहिए, ताकि लागत के अनुसार किसान कीमत तय कर सके. महंगे बीज, खाद व मजदूरी के बाद उत्पादन की कीमत कम मिलती है. क्योंकि सरकार कीमत तय करती है, पर किसान जब कीमत तय करेंगे तो उन्हें घाटा नहीं होगा तथा उनकी आर्थिक स्थिति ठीक रहेगी.
समृद्ध किये जाएं सभी तरह के सिंचाई संसाधन
किसानों ने कहा कि सभी तरह के सिंचाई संसाधनों को समृद्ध व व्यवस्थित किया जाना चाहिए, पर ऐसा नहीं हो पा रहा है. सरकारी नलकूप सरकार के सफेद हाथी हैं. नलकूप पर विभाग द्वारा हर वर्ष करोड़ों रुपए खर्च किये जाते हैं, पर किसानों को पानी नहीं मिल पाता है. जिन क्षेत्रों में नहर नहीं है, उसके लिए सरकार ने नलकूप लगाये हैं.
पर रखरखाव के अभाव में अधिकतर नलकूप बेकार पड़े हैं.
वहीं कुछ नलकूप बिजली कनेक्शन के अभाव में भी उपयोग में नहीं लाये जा रहे हैं. नलकूप विभाग द्वारा बिजली विभाग से पहल कर नलकूपों को बिजली कनेक्शन नहीं दिलवा रहा है. विभाग की सुस्ती किसानों पर भारी पड़ रही है. वहीं कृषि उत्पादन पर भी इसका काफी बुरा प्रभाव पड़ रहा है. हालांकि प्रतिवर्ष नलकूपों की मरम्मत पर काफी राशि खर्च की जाती है पर परिणाम ढाक के तीन पात की तरह होता है.
समुन्नत बाजार कराया जाये उपलब्ध
किसानों के उत्पादन के लिए सरकार द्वारा बाजार की व्यवस्था नहीं की गयी है, जबकि किसानों के नजदीक ही बाजार की व्यवस्था होनी चाहिए. उनके उत्पादन का सही कीमत किसानों को मिलना चाहिए. जिले के प्रमुख उत्पादन धान व गेहूं की फसलों का भी किसानों को उचित लाभ नहीं मिलता है. जिले में 15 नवंबर से 31 मार्च तक किसानों से धान खरीदने का समय निर्धारित किया गया था. पर जनवरी के बाद मुट्ठी भर किसान ही बच जाते हैं, जिनके पास धान रहता है. फटेहाल किसान धान होते ही उसे बेचने को मजबूर रहता है. इसी मजबूरी का लाभ बिचौलिये उठाते हैं और किसानों से औने-पौने दाम पर धान खरीद लेते है. आर्थिक दुर्दशा के साक्षात स्वरूप किसान धान महंगा होने का इंतजार नहीं कर पाता है और मजबूरी में घरेलू खर्च के लिए धान बेच देता है. उसकी दयनीय स्थिति बनाने के लिए आजादी के बाद से सरकारों ने कोई कसर नहीं छोड़ा.
वहीं अब तक गेहूं की खरीदारी का काम शुरू ही नहीं हो पाया है. इससे किसानों में काफी मायूसी है.
प्रशासन कारगर ढंग से लागू करे घोषित योजनाएं
प्रशासन को सरकार द्वारा किसानों के लिए घोषित योजनाएं कारगर ढंग से लागू करने की आवश्यकता है. सरकारी कर्मियों में संवेदनशीलता का भाव जगना चाहिए .वहीं कर्तव्य के प्रति ईमानदारी आनी चाहिए. तभी किसानों को योजनाओं का लाभ मिल सकता है. सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र के लिए कई तरह की योजनाएं चलायी जा रही हैं. किसान ही इन योजनाओं का लाभ ले पाते हैं.
कई किसानों को एक से अधिक बार योजनाओं का लाभ मिलता है, तो कई किसान इससे लगातार वंचित रह जाते हैं. बिचौलियों के कारण ऐसी स्थिति पैदा होती है.
