विफलता . आउटसोर्सिंग का लक्ष्य नहीं हो रहा है पूरा
सरकार के अभियान पर फिर रहा पानी, मरीजों को नहीं हो रहा है लाभ
आरा : मरीजों को बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने अस्पताल की कई व्यवस्थाओं को एनजीओ को देने का प्रावधान किया तथा इसके तहत टेंडर निकाल कर संस्थाओं को आउटसोर्सिंग का कार्य सौंपा, पर सरकार का यह अभियान विफल साबित हो रहा है. आउटसोर्सिंग का लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा है. इस कारण सदर अस्पताल में कुव्यवस्था का राज है. वहीं सरकार के अभियान पर पानी फिर रहा है. जिन मरीजों के लिए सरकार ने आउटसोर्सिंग की शुरुआत की थी. उन मरीजों को इस लाभ से वंचित होना पड़ रहा है. अस्पताल में हर तरफ गंदगी का राज है. वहीं मरीजों को मेनू के अनुसार भोजन भी नहीं मिल रहा है.
जबकि स्वास्थ्य लाभ के लिए मरीजों को उचित मात्रा में भोजन मिलना आवश्यक होता है. इतना ही नहीं गंदगी से बचने के लिए तथा संक्रमण से बचने के लिए सफाई व्यवस्था को लेकर सरकार ने चादर योजना की शुरुआत की थी, पर यह योजना भी सदर अस्पताल में दम तोड़ती नजर आ रही है. दिन के अनुसार चादर का रंग निर्धारित किया गया था. वहीं सरकार का महत्वाकांक्षी योजना, शराबबंदी योजना को सफल बनाने के लिए अस्पताल में नशा मुक्ति केंद्र खोला गया था, ताकि लोगों को शराब की आदत से छुटकारा दिलाया जायेगा, पर कुव्यवस्था का आलम यह है कि नशा मुक्ति केंद्र स्वयं ही बीमार है. इस हाल में नशा मुक्ति का अभियान सफल होने में संदेह है. वहीं आउटसोर्सिंग का बिना टेंडर निकाले ही मनमाने ढंग से संस्था के इसका कार्य दे दिया गया है, जिससे मरीजों को लाभ नहीं मिल पा रहा है. वहीं सरकारी राशि को काफी चूना लग रहा है.
बिना टेंडर के दिया गया आउटसोर्सिंग का कार्य : सदर अस्पताल में आउटसोर्सिंग का कार्य बिना टेंडर के ही दे दिया गया है. आउटसोर्सिंग के लिए टेंडर निकालने का नियम है. वह भी महज एक साल के लिए दिया जाता है. टेंडर निकालने के बाद कई एजेंसियों द्वारा टेंडर भरा जाता है. सबसे कम राशिवाली एजेंसी को टेंडर देने का नियम है, पर सदर अस्पताल की मनमानी का आलम यह है कि गुपचुप तरीके से आउटसोर्सिंग का कार्य दे दिया गया है. वह भी तीन साल के लिए एग्रीमेंट किया गया है.
ब्लैक लिस्टेड को दिया जाता है आउटसोर्सिंग का कार्य : सदर अस्पताल में ब्लैक लिस्टेड को भी आउटसोर्सिंग का कार्य दिया जाता है. जनवरी 2015 के पहले जिस एजेंसी को आउटसोर्सिंग का कार्य दिया गया था. वह बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति में ब्लैक लिस्टेड था. इसके बावजूद उसे यह कार्य दे दिया गया.
बिना जेनेरेटर चलाये ली जाती है राशि : सदर अस्पताल में बिजली विभाग के दावे के अनुसार प्रतिदिन 22 से 23 घंटे बिजली आपूर्ति की जाती है, पर इसके बावजूद आउटसोर्सिंग एजेंसी द्वारा प्रतिदिन आठ घंटे जेनेरेटर चलाने के नाम पर राशि ली जाती है. इससे सरकारी खजाने को काफी घाटा हो रहा है.
मेनू के अनुसार मरीजों को नहीं दिया जा रहा है भोजन : मरीजों को मेनू के अनुसार भोजन नहीं दिया जा रहा है. इससे मरीजों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पर रहा है. सरकार द्वारा एक मरीज पर प्रतिदिन भोजन के लिए 108 रुपये दिये जाते हैं, पर इसका लाभ मरीजों को नहीं मिल रहा है.
नशा मुक्ति केंद्र का लक्ष्य नहीं हो रहा है पूरा : लोगों को नशा की आदत छुड़ाने के लिए सदर अस्पताल में नशा मुक्ति केंद्र स्थापित किया गया था. पर इसका लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा है. केंद्र में जरूरत के अनुसार अटेडेंट नहीं रखे गये हैं. नियम के अनुसार 10 हजार वेतन तक 10 अटेंडेंट रखना था, पर केंद्र में महज दो अटेंडेंट ही रखे गये हैं. वह भी महज पांच हजार वेतन पर.
अस्पताल में गंदगी का है अंबार : मरीजों की सुविधा के लिए एवं स्वास्थ्य लाभ के लिए सरकार की सफाई पर विशेष ध्यान है, पर अस्पताल में गंदगी का अंबार है. सरकार द्वारा इसके लिए आउटसोर्सिंग एजेंसी को 67 पैसा प्रतिदिन प्रति वर्ग फुट के हिसाब से भुगतान किया जाता है, पर इस पैसे का क्या होता है यह अस्पताल प्रशासन तथा आउटसोर्सिंग एजेंसी ही बता सकती है.
अवैध रूप से हो रहा सिक्यूरिटी का कार्य
सदर अस्पताल में अवैध रूप से सिक्यूरिटी का कार्य कराया जा रहा है. इसके लिए टेंडर नहीं निकाला गया है. मनमाने ढंग से बिना टेंडर के ही यह कार्य कराया जा रहा है. इससे सरकार के राजस्व की हानि हो रही है.
