Bhagalpur News. अंग की आभा से आलोकित होगा राष्ट्रपति भवन, मनोज पंडित को आया बुलावा
मनोज पंडित राष्ट्रपति भवन से आमंत्रित.
-अंग क्षेत्र के विभिन्न विधा के कलाकारों व विशेषज्ञों ने की मंजूषा गुरु मनोज पंडित की सराहनायह भागलपुर और मंजूषा कला के लिए वास्तव में गौरवशाली क्षण है. राष्ट्रपति भवन से प्राप्त यह निमंत्रण न केवल मनोज पंडित की साधना का सम्मान है, बल्कि अंग जनपद की प्राचीन लोक कला की वैश्विक स्वीकार्यता का भी प्रतीक है.भागलपुर कला जगत उल्लास से भर गया है.मंजूषा कलाकार और गुरु मनोज पंडित को राष्ट्रपति भवन से ””आर्टिस्ट इन रेजिडेंसी”” कार्यक्रम के लिए आधिकारिक निमंत्रण प्राप्त हुआ है. यह पहला अवसर है जब भागलपुर का कोई कलाकार इस प्रतिष्ठित गरिमा का हिस्सा बनेगा. देशभर में शास्त्रीय संगीत क्षेत्र में नाम करने वाले पंडित शंकर मिश्र नाहर ने कहा कि मंजूषा गुरु मनोज पंडित की उपलब्धि से गौरवान्वित हूं. मंजूषा कलाकार अनुकृति मिश्रा ने कहा कि मंजूषा से जुड़े कलाकारों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी विधा के कलाकारों के लिए गौरव की बात है. युवा रंगकर्मी चैतन्य प्रकाश ने खुशी जतायी और कहा कि पहली बार राष्ट्रपति भवन में मंजूषा कला को प्रदर्शित करने का अवसर मिल रहा है. वहीं इस्टर्न बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष आलोक अग्रवाल ने कहा कि मंजूषा कला को आगे बढ़ाने के लिए लेटर पैड से लेकर अन्य जरूरी कागजात में मंजूषा को उकेरने में सहयोग किया था. अब मनोज पंडित ने राष्ट्रपति भवन तक पहुंचाया. गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता डॉ मनोज मीता, कुमार गौरव, अंजली घोष आदि ने भी सराहना की है.
साधना का सम्मान: कूची से उकेरा इतिहास
मनोज पंडित केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि मंजूषा कला के पुनर्जागरण के संवाहक रहे हैं. बिहुला-विषहरी की गाथाओं को कैनवास पर जीवंत करने वाले मनोज ने अब तक लगभग 10 हजार शिष्यों को इस कला में पारंगत किया है. भागलपुर में ””””””””मंजूषा महोत्सव”””””””” की नींव रखने से लेकर इस लोक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने तक, उनका योगदान अद्वितीय है.
राष्ट्रपति भवन में 15 से 20 अप्रैल तक होंगे कार्यक्रम
राष्ट्रपति सचिवालय की ओर से जारी आधिकारिक पत्र के अनुसार, मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित 15 अप्रैल से 20 अप्रैल 2026 तक राष्ट्रपति भवन में प्रवास करेंगे. इस विशेष आमंत्रण के तहत वे वहां मंजूषा कला का प्रदर्शन करेंगे.
सातवीं शताब्दी से राष्ट्रपति भवन तक का सफर
मंजूषा कला अंग प्रदेश (प्राचीन चंपा, वर्तमान भागलपुर) की अमूल्य विरासत है, जिसका इतिहास सातवीं शताब्दी से जुड़ा है। लंबे समय तक यह कला गुमनामी के अंधेरे में अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही थी. हालांकि, डब्लू. जी. आर्चर जैसे विशेषज्ञों ने इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का प्रयास किया, लेकिन इसे जन-जन तक पहुँचाने का श्रेय स्थानीय कलाकारों को जाता है. दिवंगत चक्रवर्ती देवी और निर्मला देवी जैसी महान कलाकारों ने इस परंपरा को जीवित रखा. निर्मला देवी के पुत्र मनोज कुमार पंडित ने अपनी माता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए मंजूषा कला को आधुनिक पहचान दिलाई। आज उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि भागलपुर के मोदीनगर तथा बरारी की गलियों से शुरू हुआ यह सफर रायसीना हिल्स तक पहुंच गया. यह निमंत्रण मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन हजारों हाथों और उस परंपरा का सम्मान है जो सदियों से चंपापुरी की गलियों में जीवित है.
मनोज पंडित, मंजूषा गुरु