bhagalpur news. गांधी विभाग में विवाद को लेकर जांच कमेटी गठित, 15 दिनों में मांगी रिपोर्ट

टीएमबीयू के पीजी गांधी विचार विभाग हेड डॉ अमित रंजन सिंह व सहायक उमेश दास के बीच हुए विवाद अब पुलिस तक पहुंच गया है

टीएमबीयू के पीजी गांधी विचार विभाग हेड डॉ अमित रंजन सिंह व सहायक उमेश दास के बीच हुए विवाद अब पुलिस तक पहुंच गया है. दूसरी तरफ विवि प्रशासन ने भी मामले को गंभीरता से लिया है. विवि के प्रभारी कुलपति प्रो विमलेंदु शेखर झा के आदेश पर मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है. कमेटी में कॉलेज इंस्पेक्टर साइंस प्रो रंजना संयोजक है. वहीं, सिंडिकेट सदस्य डॉ शंभु दयाल खेतान व एमएएम कॉलेज के प्राचार्य डॉ अवधेश रजक सदस्य है. विवि प्रशासन ने पूरे मामले में निष्पक्ष जांच करते हुए 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट मांगी, ताकि आगे की कार्रवाई की जा सकें. इसे लेकर विवि के रजिस्ट्रार प्रो रामाशीष पूर्वे ने अधिसूचना जारी की है. बता दें कि विभाग के सहायक उमेश दास ने हेड डॉ अमित रंजन सिंह पर जाति सूचक गाली-गलौज करने का आरोप लगाया है. उधर, विभाग के हेड ने सहायक पर जातिसूचक गाली-गलौज करने का आरोप लगाया है. मामला प्रकाश में आने के बाद विभाग के शिक्षक व कर्मचारी कुछ बोलने से बच रहे हैं. पठन-पाठन पर भी असर पड़ रहा है. एससीएसटी थाना की पुलिस जांच करने पहुंची

सहायक उमेश दास ने जातिसूचक गाली-गलौज करने व मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगा एससीएसटी थाना में लिखित शिकायत की थी. इस बाबत गुरुवार को थाना की पुलिस मामले की जांच करने विभाग पहुंची थी, लेकिन हेड से मुलाकात नहीं हो सकी. बताया जा रहा है कि पुलिस ने मामले को लेकर विभाग कर्मियों, शिक्षकों व छात्र-छात्राओं से पूछताछ की. मौके पर आरोप लगाने वाले सहायक उमेश दास भी मौजूद थे.

निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत मामले की हो जांच

विश्वविद्यालय विभाग शिक्षक संघ (यूडीटीए) के सचिव विवेक कुमार हिंद ने गांधी विचार विभाग में चल रहे विवाद को लेकर बयान जारी कर कहा कि घटना क्रमों को लेकर विवि के शिक्षकों में चिंता व्याप्त है. कहा कि किसी भी शिक्षक या विभागाध्यक्ष के विरुद्ध शिकायतों का निपटारा विधिसम्मत, निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए. कहा कि दुर्भाग्यवश हाल के दिनों में संवाद और संस्थागत प्रक्रिया के स्थान पर सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप का माहौल बन गया है, जो विवि की गरिमा के अनुरूप नहीं है. विशेषकर अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम जैसे संवेदनशील कानूनों के प्रयोग में अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है, ताकि न्यायिक प्रक्रिया और संस्थागत संतुलन प्रभावित न हो. उन्होंने चिंता जताई कि अन्य विभागों के शिक्षकों पर भी बिना ठोस प्रमाण के चरित्र-आधारित आरोप लगाये जा रहे हैं.

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Published by: Atul kumar

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