दो व तीन मार्च को बौंसी के मधुसूदन मंदिर में खेली जायेगी आध्यात्मिक होली
बौंसी. मंदार क्षेत्र में 2 एवं 3 मार्च को आस्था, भक्ति और रंगों का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा. मधुसूदन मंदिर में आयोजित होने वाली होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा को स्पर्श करने वाला आध्यात्मिक उत्सव है. यहां रंगों की शुरुआत चेहरे से नहीं, बल्कि हृदय से होती है. जैसे ही मंदिर परिसर में गुलाल उड़ता है, ढोल-मंजीरों की गूंज और जय मधुसूदन जय मंदार के जयकारों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठता है. ब्रज की तर्ज पर खेले जाने वाली यह पारंपरिक होली वर्षों पुरानी परंपरा को आज भी जीवंत रखे हुए है.राजस्थान से मंगवायी जा रही विशेष रंग और श्रृंगार सामग्री
इस वर्ष होली को और भी आकर्षक और भव्य बनाने के लिए विशेष तैयारी की गई है. आयोजन समिति के सदस्य अनमोल झा और पंडित अवधेश ठाकुर ने जानकारी देते हुए बताया कि राजस्थान से विशेष रंग, गुलाल, पिचकारी, राजस्थानी पगड़ी, गले में पहनने वाला दुपट्टा तथा आकर्षक मोतियों की मालाएं मंगवाई जा रही हैं. पूरे मंदिर परिसर को जय मधुसूदन जय मंदार लिखी पताकाओं से सजाया जाएगा. कृत्रिम एवं प्राकृतिक फूलों से सुसज्जित मंदिर की भव्य सजावट श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनेगी.
संकीर्तन टोली गायेगी प्रभु के लिए होली गीत
यहां की होली की एक विशेष परंपरा संकीर्तन टोली द्वारा भगवान के लिए होली गाना है. भक्तजन सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन करते हुए प्रभु मधुसूदन के साथ होली खेलते हैं. रंग, अबीर और गुलाल के बीच भक्ति रस की ऐसी धारा बहती है कि हर श्रद्धालु स्वयं को ब्रज धाम में अनुभव करता है. मधुसूदन मंदिर की होली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है. यहां किसी की पहचान उसके पद, धन या हैसियत से नहीं होती. न कोई बड़ा, न कोई छोटा सभी एक ही कतार में खड़े भक्त होते हैं. यह उत्सव समाज में समानता और भाईचारे का संदेश भी देता है.बड़ी संख्या में भक्तों की उमड़ती है भीड़
हर वर्ष की तरह इस बार भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदार क्षेत्र पहुंचने की संभावना है. दो दिनों तक चलने वाला यह उत्सव क्षेत्र को भक्तिरस, उल्लास और रंगों से सराबोर कर देगा. मंदार की यह अनोखी होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि श्रद्धा, परंपरा और आध्यात्मिक एकता का प्रतीक है. जहां भगवान मधुसूदन के संग भक्त स्वयं को रंगों में नहीं, बल्कि भक्ति में रंग लेते हैं.
