उड़ रही नियमों की धज्जियां
न डबल डोर, न इमरजेंसी खिड़की
औरंगाबाद शहर : अभी शादियों का समय चल रहा है. बसों में पैर रखने की जगह नहीं है. ऐसे में बस चालक क्षमता से अधिक यात्रियों को बसों में बैठा कर यातायात नियम की धज्जियां उड़ा रहे हैं.
अगर कोई बड़ी हादसा हो जाये, तो जिम्मेवारी लेने को कौन तैयार होगा. वैसे इस ओर परिवहन विभाग का भी कोई ध्यान नहीं है. सुबह से देर शाम तक यात्रियों से खचाखच भरी वाहन अभी सड़कों पर कभी भी देखे जा सकते हैं. हाल के दिनों में वाहन चालकों की लापरवाही से कई दुर्घटनाएं हुई हैं. बावजूद सबक लेने को कोई तैयार नहीं है. ताज्जुब की बात तो यह है कि अधिकांश बसों में न तो डबल डोर है, न इमरजेंसी खिड़की.
वैसे स्कूली वाहन भी कम नहीं हैं. स्कूल प्रशासन के जानकारी में बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंस कर स्कूल व घर ले जाया जाता है. ज्यादातर बसों में फर्स्ट एड बॉक्स की भी कोई व्यवस्था नहीं है. अगलगी की घटना को नियंत्रण करने के लिए अग्निशमक यंत्र की भी सुविधा नहीं है और न फिटनेस व प्रदूषण का सर्टिफिकेट है. इसके बावजूद सड़कों पर ऐसी बसें बेधड़क दौड़ रही है. जिला परिवहन विभाग के अधिकारियों को इसकी जानकारी भी है, पर कार्रवाई क्यों नहीं होती. यह उनसे भला कौन जान सकता है.
औरंगाबाद शहर के रामाबांध बस स्टैंड से डेहरी, सासाराम, दाउदनगर, नवीनगर, बालूगंज, गया, गोह, हसपुरा के लिए सैकड़ों बसें खुलती है, लेकिन कमोबेश हर यात्री बसों की स्थिति एक जैसी है. खासकर सासाराम, हसपुरा, बालूगंज और नवीनगर जानेवाले बसों के छज्जे पर यात्रियों की भीड़ दिखाई पड़ती है. इन जगहों पर जानेवाली एक दर्जन से ऊपर बसें एक बदहाल हालत में हैं, जिन पर नियमानुसार चढ़ने और उतरने के लिए डबल डोर की सुविधा नहीं है. बसों की हालत खराब होने से सफर के दौरान यात्रियों को परेशानी भी उठानी पड़ती है. यात्रियों के जान-जोखिम में डाल कर मनमर्जी से चल रही इन यात्री बसों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं. लेकिन, समाधान नहीं हो पा रहा है. हाल के दिनों में दाउदनगर, नवीनगर, देव व रफीगंज में यात्री वाहनों के छज्जे से गिर कर यात्री की मौत भी हुई थी.
