छठ व्रत करने से मिलती है सुख व शांति औरंगाबाद (नगर)छठ व्रत बिहार का सबसे बड़ा पर्व है. इस पर्व को वर्ष में दो बार मनाया जाता है. चैत महीना के शुक्ल पक्ष में चैती छठ व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में कार्तिक छठ. इस पर्व को ‘सूर्यषष्ठी’ और ‘ डाला छठ’ के नाम से भी जाना जाता हैं. इसमें मुख्य रूप से सूर्य की उपासना की जाती है. इस पर्व में अनेक धारणाएं जुड़ी हुई हैं. मान्यता है कि इस पर्व को निष्ठापूर्वक करने से सुख, शांति, असाध्य रोगों से मुक्ति व अन्य समस्याओं का निराकरण होता है. पुरुष व महिला बड़ी संख्या में इस पर्व को अपने परिवार के हित के लिए करते हैं. महापर्व छठ को चार चरणों में मनाया जाता है. प्रत्येक दिन का अलग-अलग महत्व है. नहाय’ खाय के साथ ही छठ पूजा की शुरुआत हो जाती है. इस दिन छठ व्रत करने वाले व्रतधारी दतुवन से मुंह धोकर नदियों में स्नान करते हैं. इस दिन व्रतधारी एक ही बार भोजन करते हैं. खरना के दूसरे दिन व्रतधारी पूरे दिन उपवास करते हैं. सूर्यास्त के बाद वे पृथ्वी पूजन कर खीर व केले का सेवन कर अपना उपवास तोड़ते है. इसके बाद संगे सबंधियों के बीच प्रसाद का वितरण किया जाता है. इस प्रसाद को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. संध्या अर्घ पर्व के तीसरे दिन व्रतधारी दिन में प्रसाद की तैयारी करते हैं. सूर्यास्त से पहले अपने परिवार के साथ नदी, तालाब आदि के किनारे जाते हैं और डूबते सूर्य को अर्घ देते हैं. इस समय महिलाएं छठ की परंपरागत गीत भी गाती हैं. इस अवसर पर गाये जाने वाली गीत पौराणिक कथाओं से युक्त होते हैं, जिसमें बिहार व उत्तरप्रदेश की संस्कृतियों की झलक दिखती है. इस दिन कई स्थानों पर अर्घ के दौरान पांच ईख, नदी, तालाब में गाड़े जाते हैं. मान्यता है कि मानव जीवन पांच तत्वों से मिल कर बना है और ईख इन पांच तत्वों का सूचक है. जिस व्रतधारी के घर में बच्चे का जन्म या विवाह होता है उस घर में इसका ज्यादा प्रचलन है. इसके अगले दिन सुबह को अर्घ दिया जाता है.
छठ व्रत करने से मिलती है सुख व शांति
छठ व्रत करने से मिलती है सुख व शांति औरंगाबाद (नगर)छठ व्रत बिहार का सबसे बड़ा पर्व है. इस पर्व को वर्ष में दो बार मनाया जाता है. चैत महीना के शुक्ल पक्ष में चैती छठ व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में कार्तिक छठ. इस पर्व को ‘सूर्यषष्ठी’ और ‘ डाला छठ’ के नाम […]
