कैसी होगी खेती, एक बूंद पानी नहीं है भीम बराज में

अंबा (औरंगाबाद): किसानों को धान की खेती करने में इस बार फिर परेशानी हो सकती है. सिंचाई के अभाव में ससमय फसल लगाने की संभावना नहीं दिखती है. सिंचाई विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार भीम बराज में एक बूंद भी पानी नहीं है. उत्तर कोयल नहर में पानी छोड़ने के लिए कुटकु डेम का […]

अंबा (औरंगाबाद): किसानों को धान की खेती करने में इस बार फिर परेशानी हो सकती है. सिंचाई के अभाव में ससमय फसल लगाने की संभावना नहीं दिखती है. सिंचाई विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार भीम बराज में एक बूंद भी पानी नहीं है. उत्तर कोयल नहर में पानी छोड़ने के लिए कुटकु डेम का निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया है. ऐसे में किसानों को धान का बिचड़ा गिरने के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है.

किसान जैसे-जैसे बिचड़ा गिरने का समय निकलते जा रहा है चिंता बढ़ती जा रही है. कई वर्षो से मोहम्मदगंज कोयल नदी में बांध लगा कर पानी छोड़ा जा रहा है. हालांकि रख रखाव व मरम्मत के अभाव में बराज की स्थिति खराब है. गेट में लगाया गया रबर शील कट जाने के कारण एक हिस्सा पानी नदी में बह जाता है. बिहार-झारखंड के बंटवारे के समय पानी का रोस्टर जिस औसतन से तैयार किया गया था, उसका अमल नहीं किया जाता है. विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार जितना पानी बराज से छोड़ा जाता है, उसका 10 प्रतिशत पानी झारखंड व 90 प्रतिशत पानी बिहार को मिलना है. अभी स्थिति यह है कि मुख्य नहर के ड्राइग डिस्चार्य में छेड़छाड़ कर लोग मनमानी ढंग से 1000 से 1200 क्यूसेक पानी झारखंड में ही रख लिया जाता है. जब इससे अधिक पानी होता है तब बिहार को नसीब होता है. मरम्मत पर खर्च भी बिहार को 90 प्रतिशत देना होता है.

752 करोड़ खर्च होने के बाद भी कार्य अधूरा

उत्तर कोयल मुख्य नहर के निर्माण कार्य शुरू हुए तकरीबन 45 वर्ष बीत गये, पर कार्य आज तक पूरा नहीं हो सका. जानकारी के अनुसार, अभी तक 752 करोड़ रुपये खर्च हो गये है. इसके बाद भी नहर अधूरा ही पड़ा है. कुटकु डेम की बात तो दूर रही बराज को भी कोई देखने वाला नहीं है. बराज में जो गेट लगाया गया है उसमें से मात्र पांच छह गेट ही ऑपरेट होता है, शेष सभी जाम है.

समाप्त होने लगा बिचड़ा उगाने का समय

लंबी अवधि वाले एमटीयू 7029 जैसे धान की नर्सरी तैयार करने का समय करीब-करीब समाप्त हो रहा है. धान की खेती के लिए उपयरुक्त रोहण नक्षत्र बीत चुका है. लेकिन अभी तक पूरे प्रखंड में कही भी बिचड़े गिराये जाने की सूचना नहीं है. कृषि विज्ञान केंद्र सिरिस के कृषि विशेषज्ञों के अनुसार समय से खेती नहीं किये जाने से उत्पादन 25 प्रतिशत से अधिक प्रभावित होता है. राजेंद्र स्वेता, सोनम आदि मध्यावधि वाले धान के बिचड़े गिराने का भी अंतिम समय 25 जून तक है. बिचड़ा नहीं लगाये जाने से किसानों की चिंता बढ़ती जा रही है. इसके लिए वे प्रकृति के रुख का देख रहे हैं. विगत दिनों तक प्रकृति का रुख तो आग ही उगल रहा था,पर इधर दो दिनों से थोड़ी नरमी आयी है. इसके बावजूद भी किसान बिचड़े लगाने से सहम जा रहे हैं. कृषि विभाग द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का लाभ भी किसानों को नहीं मिल रहा है.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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