बढ़ रहे खिलाड़ी, घट रहे मैदान

बदहाली. घोषणाओं तक सिमटा खेल सुविधाओं के विकास का मसला शहर में खिलाड़ी बढ़ रहे हैं, लेकिन खेल मैदान सिकुड़ते जा रहे हैं. शहर में तीन खेल मैदान हैं. पहला गेट स्कूल खेल मैदान, दूसरा सच्चिदानंद सिन्हा कॉलेज खेल मैदान व तीसरा गांधी मैदान. लेकिन ये मैदान, स्टेडियम तो दूर, प्ले ग्राउंड कहलाने के लायक […]

बदहाली. घोषणाओं तक सिमटा खेल सुविधाओं के विकास का मसला
शहर में खिलाड़ी बढ़ रहे हैं, लेकिन खेल मैदान सिकुड़ते जा रहे हैं. शहर में तीन खेल मैदान हैं. पहला गेट स्कूल खेल मैदान, दूसरा सच्चिदानंद सिन्हा कॉलेज खेल मैदान व तीसरा गांधी मैदान. लेकिन ये मैदान, स्टेडियम तो दूर, प्ले ग्राउंड कहलाने के लायक भी नहीं हैं. इसके अलावे शहर में छोटे-छोटे ग्राउंड जो खिलाड़ियों के अभ्यास का केंद्र हैं. ये मैदान इतने छोटे हैं कि वहां खेल तो दूर ठीक से अभ्यास भी नहीं हो पाते.
औरंगाबाद सदर : दिन-ब-दिन बच्चों में खेल के प्रति रुचि बढ़ती जा रही है, अभिभावक भी बच्चों को इतनी स्वतंत्रता दे रखे हैं कि बच्चे मनचाहे गेम खेल सकते हैं. पर खेल मैदान के अभाव में खिलाड़ियों के खेल के साथ मजाक हो रहा है.
औरंगाबाद शहर में तीन बड़े प्ले ग्राउंड है, लेकिन उन तीनों खेल मैदान पर सबका अपना वर्चस्व है. शहर के करमा मोड़ स्थित गेट स्कूल खेल मैदान पर विद्यालय से ज्यादा प्रशासन कि चलती है, तो गांधी मैदान भी प्रशासन के ही अधिकार में है.
इन खेल मैदानों के अलावे सच्चिदानंद सिन्हा कॉलेज का खेल मैदान भी काफी बड़ा है, जिस पर सिर्फ और सिर्फ कॉलेज प्रशासन का वश चलता है. ऐसे में गेट स्कूल खेल मैदान और गांधी मैदान औरंगाबाद के खिलाड़ियों के लिए इडेन गार्डन सरीखा है. शहर में करीब 100 से अधिक क्रिकेट टीम हैं, जिसके खिलाड़ी जगह के अभाव में मोहल्ले व गलियों में ही प्रैक्टिस कर लिया करते हैं, पर जब कोई टूर्नामेंट या बड़ा प्रतियोगिता आयोजित होता है, तो उस में शिरकत करने के लिए इन्हें बड़े खेल मैदान में अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है.
ऐसे में इन खिलाड़ियों को गांधी मैदान और गेट स्कूल के मैदान में अभ्यास करते एक साथ देखा जा सकता है, लेकिन इनके सामने बड़ी परेशानी यह है कि एक साथ कई टीमें एक खेल मैदान में एक साथ अभ्यास ठीक से नहीं कर पातीं. नतीजा यह है कि नेशनल खेलना तो दूर, स्टेट लेवल चैंपियनशिप में भी पहुंचने के हकदार नहीं बन पाते.
अधिकारी नहीं देते ध्यान : क्रिकेट के खिलाड़ी संकेत कुमार, पप्पू कुमार, रिशु कुमार, लक्की कुमार आदि कहते हैं कि जिले के खेल पदाधिकारी की अनदेखी के कारण मैदानों की स्थिति खस्ताहाल है. एक मैदान पर आधे दर्जन टीम प्रैक्टिस करती है. न तो मैदान में ग्रास है न वाटरिंग की व्यवस्था और न ही लाइट. खिलाड़ियों ने कहा कि 15 जुलाई 2017 को खेल पदाधिकारी के रूप में शमीम अख्तर ने जिले का कार्यभार संभाला है. तब से अब तक जिले में कोई खेल का आयोजन भी नहीं हुआ है. इस संबंध में पक्ष जानने के लिए जिला खेल पदाधिकारी शमीम अख्तर के मोबाइल 9097012267 पर लगातार कोशिश के बावजूद संपर्क नहीं हो सका.
खेल मैदान के बिना मिट रही प्रतिभा : जितेंद्र
जिला क्रिकेट टीम के नेतृत्वकर्ता सह संवेदक जितेंद्र सिंह कहते हैं कि जिले में सैकड़ों स्कूल हैं, लेकिन वहां खेल मैदान नहीं है. खेल मैदान के अभाव में प्रतिभाएं निखर कर सामने नहीं आ रही.
शहर में भी खेल मैदान का अभाव है. शहर में जो मैदान है, उसमें इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं. खिलाड़ियों के लिए कोई व्यवस्था नहीं. अपने पैसे लगा कर खिलाड़ी क्रिकेट के लिए पीच तैयार करते हैं. टर्फ की तो बात ही नहीं करनी. खेल मैदान की स्थिति जब तक नहीं सुधरेगी, खिलाड़ियों का पलायन होते रहेगा. वर्षों से लीग मैच भी ठीक से नहीं हो सका है. मैदानों की स्थिति सुधारने के लिए डीपीआर तैयार कर उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है.
20 हजार खर्च कर बनाया मैदान, लग गया मेला : संतोष
फुटबॉल के बेहतरीन प्लेयर सह समाजसेवी संतोष गुप्ता कहते हैं कि गेट स्कूल खेल मैदान का ख्याल रखने में जिला प्रशासन बहुत पीछे है. जिला खेल पदाधिकारी शमीम अख्तर भी इस पर ध्यान नहीं देते. इनके वरीय पदाधिकारी डीडीसी भी कुछ नहीं कर रहे. जिले के खिलाड़ियों की प्रतिभा मर रही है.
कुछ महीने पहले फुटबॉल खिलाड़ियों ने आपस में चंदा कर 20 हजार रुपये की लागत से प्ले ग्राउंड पर काम कराया था. फिल्ड को ठीक किया गया था, लेकिन उस मैदान में मेला लगाने के लिए प्रशासनिक अनुमति दे दी गयी. फिर से प्ले ग्राउंड खराब हो गया.
खिलाड़ी बनने का सपना कैसे होगा पूरा : मिलिंद
क्रिकेट व फुटबॉल दोनों ही खेल में रुचि रखनेवाले मिलिंद सागर पहला आयडल अपने पिता और दूसरा धोनी को मानते हैं. मिलिंद के पिता फुटबॉलर हैं और धोनी भी दोनों खेलों में रुचि रखते हैं. मिलिंद का कहना है कि तेज गेंदबाजी का शौक रखता हूं, पर शहर में कोई ऐसा खेल मैदान नहीं, जहां नियमित अभ्यास किया जा सके. गली मुहल्ले में खेल कर खिलाड़ियों की प्रतिभा नहीं निखर सकती. गेंदबाजी के लिए अच्छे पीच की जरूरत होती है, जो यहां उपलब्ध नहीं.
नहीं है कोई व्यवस्था, कैसे खेलें क्रिकेट : काबिश
क्रिकेट खिलाड़ी मो काबिश हसन कहते हैं कि खिलाड़ियों के दर्द से जिला प्रशासन का कोई वास्ता नहीं है. सभी अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं. खिलाड़ियों के लिए खेल में बहुत से स्कोप है, पर खेल मैदान के अभाव में खिलाड़ी निखर नहीं पा रहे. मजबूरी में खिलाड़ियों का पलायन हो रहा है. शहर के खेल मैदान न तो साफ रहते हैं और न ही उनमें कोई व्यवस्था है. आखिर खिलाड़ी कैसे क्रिकेट खेलें. आउटडोर गेम के लिए प्ले ग्राउंड की कमी है.
मेला व प्रशासनिक आयोजनों के लिए प्रसिद्ध हैं ये दोनों मैदान
शहर के दो बड़े खेल मैदान प्रशासनिक आयोजनों व मेलाें के लिए काफी प्रसिद्ध हैं. खिलाड़ी लाख ग्राउंड को ठीक करने का प्रयास कर लें, पर वह ज्यादा समय तक ठीक रख नहीं पाते. गेट स्कूल में अक्सर सरकारी आयोजन होते रहते हैं. साथ ही, चुनाव के समय यह मैदान गाड़ियों का पार्किंग स्टैंड होता है. ऐसे में यहां खिलाड़ी प्रैक्टिस नहीं कर पाते. वहीं शहर का गांधी मैदान सालों भर खुला शौचालय बना रहता है, यहां महादलित टोलों के लोग शौचालय के अभाव में खुले में शौच करने पर विवश हैं. जब कभी कोई प्रशासनिक आयोजन जैसे 15 अगस्त और 26जनवरी सर पर होता है, तो इसे साफ कराया जाता है. बाकी के दिनों में ये मैदान गंदगी से पटा रहता है.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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