नये फैशन का इस त्योहार पर नहीं दिखता असर
औरंगाबाद सदर : छठ महापर्व के पूजन विधि की परंपरा जैसे पहले थी, आज भी वैसे ही बरकरार है. छठ की पूजन विधि परंपरागत तरीके से एक जैसी ही चली आ रही है. नये छठव्रती भी बुजुर्गों के बताये नियमों के अनुसार ही पूजा करते हैं.
70 वर्षीय वृद्ध मालती देवी कहती हैं कि उन्होंने बचपन में मां को जिस तरह पूजा करते देखा, वैसा ही ससुराल में भी होता रहा और उनकी बहूएं भी उन्हीं के तर्ज पर पूजन विधि को अपनाये हुए हैं और छठ का अनुष्ठान कर रही हैं. इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ. छठ की शुरुआत नहाय -खाय से हो जाती है. इस दिन व्रती स्नान कर अरवा चावल, चना दाल व कद्दू की सब्जी बनाते हैं.
इसमें प्याज, लहसुन से परहेज किया जाता है. भोजन में सेंधा नमक व घी का प्रयोग होता है. व्रतियों के भोजन के बाद ही परिवार के अन्य लोग प्रसाद खाते हैं. अगले दिन खरना होता है.
व्रती महिलाएं दिनभर निर्जला रह कर शाम में रोटी व गुड़ से बनी खीर बनाती हैं, फिर भगवान सूर्य का ध्यान कर उन्हें भोग लगाती हैं. पूजा के बाद ही वह अन्न ग्रहण करती हैं. अगले दिन छठ होता है. व्रती महिलाएं आटे या मैदे का ठेकुआ बनाती हैं. फिर केले सहित नारियल, मुली, सुथनी, अखरोट, बादाम, नारियल व फलों को धोकर सूप व डाला में रखा जाता है. शाम और सुबह को सूर्य को अर्घ देने के साथ ही पर्व का समापन होता है.
