गैसलाइट व टॉर्च की रोशनी में किया जाता है पोस्टमार्टम

दो साल पहले ही पूरा हो गया था नये पोस्टमार्टम हाउस का निर्माण पुराने भवन में होनेवाली दिक्कत को लेकर आपत्ति जता चुके हैं डॉक्टर औरंगाबाद कार्यालय : सरकारी नौकर हूं, सरकारी नौकरी करता हूं. खुद के साथ-साथ परिवार का भोजन चलाना है. साहब से पंगा लेकर नौकरी तो गंवाना नहीं है. अब दिन में […]

दो साल पहले ही पूरा हो गया था नये पोस्टमार्टम हाउस का निर्माण
पुराने भवन में होनेवाली दिक्कत को लेकर आपत्ति जता चुके हैं डॉक्टर
औरंगाबाद कार्यालय : सरकारी नौकर हूं, सरकारी नौकरी करता हूं. खुद के साथ-साथ परिवार का भोजन चलाना है. साहब से पंगा लेकर नौकरी तो गंवाना नहीं है. अब दिन में पोस्टमार्टम करना हो या रात में आदेश तो आदेश है. भले ही जान क्यों न चली जाये. वैसे दिन के रोशनी में परेशानी उतनी नहीं होती है, जितनी शाम ढलने के बाद ही.
सच कहूं तो ऊपरवाले से विनती करता हूं कि रात में पोस्टमार्टम का नौबत न आये.
कई दफे जर्जर पड़े पोस्टमार्टम हाउस में विषैले सांपों से भी सामना हुआ है, पर वे मजबूरी का इंसान समझ कर अपना रास्ता बदल देते हैं, लेकिन कब तक. अस्पताल के तमाम डॉक्टर रात में पोस्टमार्टम करने से भय खाते हैं. पर उनकी मजबूरी उन्हें खींच कर पहुंचा देती है. ये शब्द उन डॉक्टरों के है, जो अपना नाम छुपा कर कुछ कहना चाहते हैं. सदर अस्पताल में कार्यरत स्वीपर (जो शवों का पोस्टमार्टम करता है) राजाराम भी कुछ बोलने से इनकार करता है, लेकिन उसकी व्यथा उसकी आंखें बता देती हैं.
मंगलवार की रात प्रभात खबर ने सदर अस्पताल के पुराने और नये पोस्टमार्टम हाउस की पड़ताल की. देर शाम सदर अस्पताल में कार्यरत ममता गंगोत्री कुमारी के शव का पुराने पोस्टमार्टम हाउस में पोस्टमार्टम किया जा रहा था. पोस्टमार्टम हाउस में शव पहुंचने के बाद टॉर्च की रौशनी में कीचड़ भरी सड़कों को पार करते हुए डॉ सरताज अहमद और डाॅ आरबी चौधरी, स्वीपर राजाराम के साथ पहुंचे.
शव वाहन से गैसलाइट और टॉर्च की रोशनी में शव को उतार कर बदहाल पड़े पोस्टमार्टम हाउस में रखा गया और फिर उसी गैसलाइट और टॉर्च की रोशनी में लगभग 20 मिनट तक पोस्टमार्टम की कार्रवाई पूरी हुई. इस सीन को देखते हुए शव के साथ रहे परिजनों का कलेजा जब कांप गया, तो उन स्वास्थ्यकर्मियों का क्या हाल होता होगा, जो ऐसे पोस्टमार्टम हर दिन, रात के अंधरे में करते हैं.
जुआरियों का अड्डा बना पोस्टमार्टम हाउस : पोस्टमार्टम हाउस की बदहाली और डॉक्टरों की आनाकानी के बाद नये पोस्टमार्टम हाउस निर्माण को तीन साल पहले मंजूरी मिली थी.
वर्ष 2015 में निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ और कुछ ही महीनों में बन कर तैयार भी हो गया. पोस्टमार्टम हाउस के साथ-साथ शीतगृह व अन्य सुविधाओं से लैस भवन पर लगभग 65 लाख रुपये खर्च हो गये. लेकिन पोस्टमार्टम हाउस शुरू नहीं हुआ. अब स्थिति यह है कि शुरू होने से पहले ही भवन के खिड़कियों में लगे सारे कांच असामाजिक तत्वों ने तोड़ डाले. यहां तक कि पानी के लिए लगी मोटर भी उखाड़ कर चोर लेते गये.
क्या कहते हैं पदाधिकारी
अक्तूबर माह के प्रारंभ तक नये पोस्टमार्टम हाउस को शुरू कर दिया जायेगा. असामाजिक तत्वों ने नये भवन को कुछ नुकसान पहुंचाया है, जिसे ठीक किया जा रहा है. असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई के लिए भी लिखा गया है.
मनोज कुमार, डीपीएम, स्वास्थ्य विभाग

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