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Ram Navmi 2021 Date, Bada Mangalwar: आज ऐसे करें हनुमान जी की पूजा, मनोकामनाएं होंगी पूरी, जानें पूजा विधि, मंत्र, चालीसा, आरती और बजरंग बाण

By Prabhat khabar Digital
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Ramnavmi 2021 Date, Bada Mangalwar 2021, Hanuman Chalisa, Chaupai, Bajrang Baan, Aarti
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Ramnavmi 2021 Date, Bada Mangalwar 2021, Hanuman Chalisa, Chaupai, Bajrang Baan, Aarti, Hanuman Ji Ki Puja Vidhi: आज दूसरी या बड़ा मंगलवार (Bada Mangalwar) है. 21 अप्रैल 2021 को रामनवमी है. इससे पहले राम भक्त हनुमान की पूजा धूमधाम से करनी की परंपरा होती है. वैसे भी हिंदू धर्म में मंगलवार का दिन भगवान हनुमान को समर्पित माना गया है. ऐसी मान्यता है कि विधिपूर्वक इनकी पूजा मंगलवार को करने से बड़े से बड़े समस्याओं का निवारण हो जाता है. ऐसे में आइये देखते हैं हनुमान जी की पूजा विधि (Hanuman Ji Puja Vidhi), आरती, चालिसा (Hanuman Chalisa) और बजरंग बाण (Bajrang Baan)....

मंगलवार हनुमान पूजा विधि (Mangalwar Hanuman Puja Vidhi)

  • इस मंगलवार शाम में नहा-धो कर हनुमान मंदिर जाए

  • पूरे दिन इस मंत्र का जाप करें: 'ॐ श्री हनुमंते नम:'.

  • हनुमान जी को सिंदूर, लाल वस्त्र, जनेऊ, लाल फूल आदि चढ़ाएं और आरती दिखाएं.

  • उन्हें लड्डू का भोग पसंद है ऐसे में प्रसाद के तौर पर अर्पित करें

  • साथ ही साथ पान का बीड़ा, पंच मेवा का भोग, इमरती, चने, चूरमा, गुड़, केले आदि भी अर्पित करें

  • इसके बाद रामचरितमानस के सुंदर कांड, हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करें.

  • अंत में हनुमान जी की आरती करके उनसे मनोकामनाएं मांगे

हनुमान जी की आरती (Hanuman Ji Ki Aarti)

आरती कीजै हनुमान लला की. दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

जाके बल से गिरिवर कांपे. रोग दोष जाके निकट न झांके॥

अंजनिपुत्र महा बलदायी, संतन के प्रभु सदा सहाई॥

दे बीरा रघुनाथ पठाये, लंका जारि सिया सुधि लाये॥

लंका-सो कोट समुद्र-सी खाई, जात पवनसुत बार न लाई॥

लंका जारि असुर संहारे, सियारामजी के काज संवारे॥

लक्ष्मण मूर्छित परे सकारे, आनि संजीवन प्रान उबारे॥

पैठि पताल तोरि जम-कारे, अहिरावन की भुजा उखारे॥

बाएं भुजा असुरदल मारे, दहिने भुजा सन्तजन तारे॥

सुर नर मुनि आरती उतारे, जय जय जय हनुमान उचारे॥

कंचन थार कपूर लौ छाई, आरति करत अंजना माई॥

जो हनुमानजी की आरति गावै, बसि बैकुण्ठ परम पद पावै॥

यहां से पढ़ें बजरंग बाण (Bajarang Baan)

दोहा

निश्चय प्रेम प्रतीति ते,बिनय करै सनमान।

तेहि के कारज सकल शुभ,सिद्ध करै हनुमान॥

चौपाई

जय हनुमन्त सन्त हितकारी।सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥

जन के काज विलम्ब न कीजै।आतुर दौरि महा सुख दीजै॥

जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा।सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥

आगे जाय लंकिनी रोका।मारेहु लात गई सुर लोका॥

जाय विभीषण को सुख दीन्हा।सीता निरखि परम पद लीन्हा॥

बाग उजारि सिन्धु महं बोरा।अति आतुर यम कातर तोरा॥

अक्षय कुमार मारि संहारा।लूम लपेटि लंक को जारा॥

लाह समान लंक जरि गई।जय जय धुनि सुर पुर महं भई॥

अब विलम्ब केहि कारण स्वामी।कृपा करहुं उर अन्तर्यामी॥

जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता।आतुर होइ दु:ख करहुं निपाता॥

जय गिरिधर जय जय सुख सागर।सुर समूह समरथ भटनागर॥

ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले।बैरिहिं मारू बज्र की कीले॥

गदा बज्र लै बैरिहिं मारो।महाराज प्रभु दास उबारो॥

ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो।बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो॥

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त कपीसा।ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥

सत्य होउ हरि शपथ पायके।रामदूत धरु मारु धाय के॥

जय जय जय हनुमन्त अगाधा।दु:ख पावत जन केहि अपराधा॥

पूजा जप तप नेम अचारा।नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥

वन उपवन मग गिरि गृह माहीं।तुमरे बल हम डरपत नाहीं॥

पाय परौं कर जोरि मनावों।यह अवसर अब केहि गोहरावों॥

जय अंजनि कुमार बलवन्ता।शंकर सुवन धीर हनुमन्ता॥

बदन कराल काल कुल घालक।राम सहाय सदा प्रतिपालक॥

भूत प्रेत पिशाच निशाचर।अग्नि बैताल काल मारीमर॥

इन्हें मारु तोहि शपथ राम की।राखु नाथ मरजाद नाम की॥

जनकसुता हरि दास कहावो।ताकी शपथ विलम्ब न लावो॥

जय जय जय धुनि होत अकाशा।सुमिरत होत दुसह दु:ख नाशा॥

चरण शरण करि जोरि मनावों।यहि अवसर अब केहि गोहरावों॥

उठु उठु चलु तोहिं राम दुहाई।पांय परौं कर जोरि मनाई॥

ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता।ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता॥

ॐ हं हं हांक देत कपि चञ्चल।ॐ सं सं सहम पराने खल दल॥

अपने जन को तुरत उबारो।सुमिरत होय आनन्द हमारो॥

यहि बजरंग बाण जेहि मारो।ताहि कहो फिर कौन उबारो॥

पाठ करै बजरंग बाण की।हनुमत रक्षा करै प्राण की॥

यह बजरंग बाण जो जापै।तेहि ते भूत प्रेत सब कांपे॥

धूप देय अरु जपै हमेशा।ताके तन नहिं रहे कलेशा॥

दोहा

प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै,सदा धरै उर ध्यान।

तेहि के कारज सकल शुभ,सिद्ध करै हनुमान॥

यहां से पढ़ें हनुमान चालिसा (Hanuman Chalisa)

दोहा

श्री गुरु चरन सरोज रज,निज मनु मुकुर सुधारि।

बरनउं रघुबर विमल जसु,जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिकै,सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं,हरहु कलेश विकार॥

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

राम दूत अतुलित बल धामा।अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

महावीर विक्रम बजरंगी।कुमति निवार सुमति के संगी॥

कंचन बरन बिराज सुवेसा।कानन कुण्डल कुंचित केसा॥

हाथ वज्र औ ध्वजा बिराजै।काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

शंकर सुवन केसरीनन्दन।तेज प्रताप महा जग वन्दन॥

विद्यावान गुणी अति चातुर।राम काज करिबे को आतुर॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।राम लखन सीता मन बसिया॥

सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा।विकट रुप धरि लंक जरावा॥

भीम रुप धरि असुर संहारे।रामचन्द्र के काज संवारे॥

लाय सजीवन लखन जियाये।श्रीरघुवीर हरषि उर लाये॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

सहस बदन तुम्हरो यश गावैं।अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।नारद सारद सहित अहीसा॥

जम कुबेर दिकपाल जहां ते।कवि कोबिद कहि सके कहां ते॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना।लंकेश्वर भये सब जग जाना॥

जुग सहस्त्र योजन पर भानू ।लील्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।जलधि लांघि गए अचरज नाहीं॥

दुर्गम काज जगत के जेते।सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

राम दुआरे तुम रखवारे।होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।तुम रक्षक काहू को डरना॥

आपन तेज सम्हारो आपै।तीनों लोक हांक तें कांपै॥

भूत पिशाच निकट नहिं आवै।महावीर जब नाम सुनावै॥

नासै रोग हरै सब पीरा।जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

संकट ते हनुमान छुड़ावै।मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥

सब पर राम तपस्वी राजा।तिन के काज सकल तुम साजा॥

और मनोरथ जो कोई लावै।सोइ अमित जीवन फ़ल पावै॥

चारों जुग परताप तुम्हारा।है परसिद्ध जगत उजियारा॥

साधु सन्त के तुम रखवारे।असुर निकन्दन राम दुलारे॥

अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता।अस बर दीन जानकी माता॥

राम रसायन तुम्हरे पासा।सदा रहो रघुपति के दासा॥

तुम्हरे भजन राम को पावै।जनम जनम के दुख बिसरावै॥

अन्तकाल रघुबर पुर जाई।जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥

और देवता चित्त न धरई।हनुमत सेई सर्व सुख करई॥

संकट कटै मिटै सब पीरा।जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

जय जय जय हनुमान गोसाई।कृपा करहु गुरुदेव की नाई॥

जो शत बार पाठ कर सोई।छूटहिं बंदि महा सुख होई॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा।कीजै नाथ ह्रदय महँ डेरा॥

दोहा

प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान.

तेहि के कारज शकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान..

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