Pradosh Vrat 2026: आज 1 मार्च 2026, रविवार को प्रदोष व्रत किया जा रहा है. यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है. सप्ताह के जिस दिन प्रदोष व्रत पड़ता है, उसी दिन के अनुसार इस व्रत का नाम रखा जाता है. इस बार रविवार के दिन यह व्रत किया जा रहा है, इसलिए इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जा रहा है. मान्यता है कि इस व्रत को करने से जीवन के सभी दुख-दर्द और कष्ट दूर होते हैं तथा जीवन में खुशहाली आती है.
रवि प्रदोष व्रत पूजा शुभ मुहूर्त
- रवि प्रदोष व्रत: 01 मार्च 2026, दिन रविवार
- त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ: 28 फरवरी 2026, रात 08 बजकर 05 मिनट पर
- त्रयोदशी तिथि समाप्त: 01 मार्च 2026, शाम 06 बजकर 30 मिनट पर
- पूजा का शुभ समय: 01 मार्च को सुबह 07 बजकर 40 मिनट से 12 बजकर 02 मिनट तक
- प्रदोष काल पूजा का शुभ समय: 01 मार्च को शाम 05 बजकर 51 मिनट से 08 बजकर 56 मिनट तक
- व्रत पारण का शुभ समय: 02 मार्च को सुबह 06 बजकर 12 मिनट से 07 बजकर 38 मिनट तक
भगवान शिव चालीसा
॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान.
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
श्री शिव चालीसा पाठ
जय गिरिजा पति दीन दयाला. सदा करत संतों प्रतिपाला॥
भाल चंद्रमा सोहत नीके. कानन कुंडल नागफनी के॥
अंग गौर, शिर गंग बहाए. मुंडमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे. छवि को देख नाग मन मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी. बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी. करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नंदी गणेश सोहैं तहँ कैसे. सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ. या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा. तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी. देवन सब मिलि तुम्हहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ. लव निमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा. सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई. सभहि कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी. पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं. सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद माहि महिमा तुम गाई. अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रकटे उदधि मंथन में ज्वाला. जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई. नीलकंठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा. जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी. कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई. कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर. भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी. करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै. भ्रमित रहौं मोहि चैन न आवै॥
त्राहि-त्राहि मैं नाथ पुकारो. येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो. संकट ते मोहि आन उबारो॥
मात-पिता भ्राता सब होई. संकट में पूछत नहीं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी. आय हरहु मम संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदा हीं. जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी. क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन. मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं. शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमः शिवाय. सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई. ता पर होत है शंभु सहाई॥
ऋणी जो कोई हो अधिकारी. पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र होने की इच्छा जोई. निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पंडित त्रयोदशी को लावे. ध्यानपूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा. ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे. शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म-जन्म के पाप नसावे. अंत धाम शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी. जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
॥ दोहा ॥
नित्य नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीसा.
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
माघसिर छठि हेमंत ऋतु, संवत चौसठ जान.
स्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
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