Mauni Amavasya 2026: इंद्रियां मौन होंगी तभी मन भी रहेगा मौन

Mauni Amavasya 2026: इंद्रियां मौन होंगी तभी मन भी रहेगा मौन. जानें मौन व्रत, इंद्रिय संयम और आत्मशुद्धि का आध्यात्मिक रहस्य.

    सलिल पांडेय, मिर्जापुर

    Mauni Amavasya 2026: मौनी अमावस्या केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आत्मा की ओर लौटने का दिव्य अवसर है. यह पर्व हमें बाहरी शोरगुल, भौतिक आकर्षणों और चंचल प्रवृत्तियों से हटाकर अंतर्जगत की शांति में प्रवेश कराता है। ‘मौनी’ शब्द स्वयं संकेत करता है कि यह उत्सव शब्दों से नहीं, अनुभूति से जुड़ा है. यह आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और भगवद् चिंतन का महापर्व है.

    मौन का वास्तविक अर्थ : केवल वाणी नहीं, इंद्रियों का भी संयम

    मौन का अर्थ मात्र मुख से न बोलना नहीं है. शास्त्रीय दृष्टि से मौन तभी सिद्ध होता है जब मन को प्रभावित करने वाली पांचों ज्ञानेंद्रियां और कर्मेंद्रियां भी संयमित हों. यदि आंखें, कान, जिह्वा, त्वचा और नासिका बाहरी विषयों में रमी रहें, तो मन स्वतः अशांत रहेगा. मन के चंचल होने पर मौन एक दिखावा मात्र बनकर रह जाता है। इसलिए मौनी अमावस्या पर इंद्रिय-संयम के साथ मन को विराम देना ही सच्चा मौन है.

    मन, मौन और मनन : साधना की त्रिवेणी

    इस पर्व पर तीन शब्द विशेष ध्यान देने योग्य हैं—मन, मौन और मनन. ‘मन’ दो अक्षरों का है, ‘मौन’ ढाई का और ‘मनन’ तीन अक्षरों का. यह क्रम अपने आप में साधना की प्रक्रिया को दर्शाता है. मन यदि कर्मेंद्रियों और ज्ञानेंद्रियों के दो पाटों के बीच भटकता रहे, तो मौन संभव नहीं. साधना के माध्यम से जब शरीर और इंद्रियों को बाह्य प्रभावों से मुक्त किया जाता है, तभी मौन की अवस्था आती है. और जब मौन स्थिर हो जाता है, तब मनन आरंभ होता है. यही मनन अंतर्जगत में उस अमृत वर्षा को जन्म देता है, जिसकी तुलना किसी भी सांसारिक उपलब्धि से नहीं की जा सकती.

    मौन का वैज्ञानिक पक्ष : ऊर्जा संचय की प्रक्रिया

    मौन का वैज्ञानिक महत्व भी अत्यंत गहन है. जब मनुष्य मौन में जाता है, तो उसका शरीर शून्य में प्रवाहित तरंगीय शक्तियों को अधिक प्रभावी रूप से ग्रहण करने लगता है. ठीक वैसे ही जैसे स्विच ऑफ करने पर यंत्रों की बैटरी शीघ्र चार्ज हो जाती है. वायु में व्याप्त तरंगें, जल में समाहित औषधीय गुण, सूर्य किरणों की ऊर्जा, धरती से प्राप्त पोषक तत्व और अंतरिक्ष से प्रवाहित सूक्ष्म ऊर्जा—सबका अवशोषण मौन की अवस्था में तीव्र हो जाता है. यही कारण है कि मौन शरीर और मन, दोनों के लिए संजीवनी समान है.

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    विंध्याचल और मौन की शक्ति : एक पौराणिक दृष्टांत

    पौराणिक कथा के अनुसार, जब आदिपर्वत विंध्याचल ने क्रोधवश अपना विस्तार इतना बढ़ा लिया कि सूर्य का मार्ग बाधित होने लगा, तब देवताओं ने उसके गुरु अगस्त्य मुनि से सहायता मांगी. अगस्त्य के आदेश पर विंध्याचल ने मौन धारण कर लिया. यह मौन ही उसकी महानता का कारण बना. उसी मौन की शक्ति से वह अजेय हुआ और महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती सहित अनेक देवी-देवताओं ने वहां सिद्धियां प्राप्त कीं.

    मौनी अमावस्या : अनंत शक्तिदायी तिथि

    चंद्रमा का अमावस्या को न दिखना भी 16वीं कला है. पूर्णिमा से अमावस्या तक की यात्रा करते हुए चंद्रमा ओझल हो जाता है.

    • इस दिन आकाश से अनेक पोषक किरणें निकलती हैं.
    • चंद्रमा मन के देवता हैं, जबकि सूर्य शरीर के. सूर्य रक्त, मज्जा, मांस, अस्थि को पुष्ट करते हैं.
    • माघ माह में सूर्य के उत्तरायण होते अद्भुत तरंगों का प्रवाह धरती पर होता है. आदिकाल में ऋषि-मुनि इस अवधि में नदी तट पर तप कर उसका लाभ लेते रहे हैं.
    • सम्राट हर्षवर्धन प्रयाग संगम में स्वयं आते रहे.
    • माघ माह की मौनी अमावस्या को मौनव्रत करने से अद्भुत आंतरिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है.

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    लेखक के बारे में

    By Shaurya Punj

    मैंने डिजिटल मीडिया में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव हासिल किया है. पिछले 6 वर्षों से मैं विशेष रूप से धर्म और ज्योतिष विषयों पर सक्रिय रूप से लेखन कर रहा हूं. ये मेरे प्रमुख विषय हैं और इन्हीं पर किया गया काम मेरी पहचान बन चुका है. हस्तरेखा शास्त्र, राशियों के स्वभाव और उनके गुणों से जुड़ी सामग्री तैयार करने में मेरी निरंतर भागीदारी रही है. रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद. इसके साथ साथ कंटेंट राइटिंग और मीडिया से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए मेरी मजबूत पकड़ बनी. इसके अलावा, एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और शिक्षा जैसे विषयों पर भी मैंने गहराई से लेखन किया है, जिससे मेरी लेखन शैली संतुलित, भरोसेमंद और पाठक-केंद्रित बनी है.

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