Mauni Amavasya 2026: मौनी अमावस्या आज, आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और भगवद् चिंतन का महापर्व

Mauni Amavasya 2026: मौनी अमावस्या आज 18 जनवरी 2026 को है. ये दिन आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और भगवद् चिंतन के लिए जाना जाता है. जानें स्नान, मौन व्रत, दान और आध्यात्मिक महत्व.

आज मौनी अमावस्या पर जानें महत्व

महामहोपाध्याय आचार्य डॉ सुरेंद्र कुमार पाण्डेय
पूर्व आइएएस
प्रयागराज, त्रिवेणी संगम क्षेत्र

Mauni Amavasya 2026: माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है. इस दिन भुवन भास्कर सूर्य और चंद्रमा एक साथ मकर राशि में रहते हैं. वैसे तो प्रत्येक अमावस्या का स्नान, पूजा-पाठ, व्रत, जप, दान और साधना की दृष्टि से महत्व होता है, परंतु मौनी अमावस्या का साधना और मन की शुद्धि हेतु अतिशय महत्व शास्त्रों में वर्णित है.

भारत की आध्यात्मिक परंपरा और पर्वों का उद्देश्य

हमारा देश भारत आदि काल से ही धर्म और अध्यात्म -प्रधान देश रहा है. यहां पर ऐहिक अभ्युदय से पारलौकिक अभ्युदय को अधिक महत्व दिया गया है. इसी को दृष्टिगत रखते हुए भारतीय मनीषा ने प्राचीन काल से ही अनेक पर्वों, अनुष्ठानों और साधना, उपासना के साथ प्रकृति पूजा, उसके संरक्षण व उससे जुड़ने का विधान किया है.

माघ कृष्ण अमावस्या : युगादि तिथि का महत्व

माघ कृष्ण अमावस्या युगादि तिथि है. इसी दिन द्वापर युग का आरंभ हुआ था. इस दिन सनातनी हिंदू पवित्र नदियों में मौन रहकर स्नान करते हैं और तत्पश्चात् पूजा, अर्चना, जप और दान करते हैं.

पितृ तर्पण और पिंडदान का फल

इस दिन पितरों को तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते हैं. शास्त्रों के अनुसार, आज पितरों को पिंडदान करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है. गरीबों को तिल, गुड़, चावल, दूध, कंबल, उपानह, गाय, शय्या, अंजन, दर्पण और वस्त्र दान करने से अक्षय फल प्राप्त होता है. दान देते समय- ‘यत्किंचिद् वाचिकं पापं मानसं कायिकं तथा। तत् सर्वं नाशमायाति युगातिथिपूजनात् ।’ पितरों को तर्पण और पिंडदान करने के बाद उनसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए –
दातारों नोsभिवर्धन्तां वेदा: सन्तति रेव च ।
श्रद्धा च नो मां व्यगमद् बहुदेवं च नोsस्त्विति।।
अग्नि पुराण।
अर्थात्- हे पितरगण! आप ऐसा आशीर्वाद प्रदान करें कि हमारे कुल में दान-दाताओं की वृद्धि हो, नित्य वेद और पुराण का स्वाध्याय करने वालों की वृद्धि हो, हमारी संतान परंपरा लगातार बढ़ती रहे, सत्कर्म करने में हमारी श्रद्धा कम न हो और हमारे पास दान देने के लिए बहुत सा धन-वैभव हो.

त्रिवेणी संगम में मौन स्नान की अद्भुत महिमा

इस दिन प्रयागराज के गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम में मौन रहकर स्नान करने की महिमा और उससे प्राप्त होने वाले पुण्य का वर्णन शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता.

कल सूर्योदय से लेकर दिन भर स्नान का पुण्य काल

इस वर्ष मौनी अमावस्या पर संगम और अन्य पवित्र नदियों में मौन रहकर स्नान का पुण्य काल रविवार, 18 जनवरी को सूर्योदय से लेकर पूरे दिन भर है. इस प्रकार उदयातिथि के अनुसार, 18 जनवरी को पूरे दिन अमावस्या मनायी जायेगी. अमावस्या की तिथि 18 जनवरी को 12:03 (AM) से 19 जनवरी को 1.21 (AM) तक रहेगी. माघ कृष्ण अमावस्या को रविवार और व्यतीपात योग हो तो अर्धोदय योग होता है.
स्कन्द पुराण के अनुसार, इस योग में सभी स्थानों का जल गंगा तुल्य हो जाता है और सभी ब्राह्मण ब्रह्मसंनिभ शुद्धात्मा हो जाते हैं.

स्नान के पश्चात् इस दिन किया गया जप, तप और दान का अनंत गुना फल प्राप्त होता है. इस दिन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए, सदाचरण और संयमपूर्वक मौन रहकर आत्मविश्लेषण करें और परमात्मा का ध्यान करें.

वैसे तो वृद्ध मनु ने सदैव स्नान के समय बोलने का निषेध किया है, और लिखा है कि स्नान करते समय बोलने वाले के तेज को वरुण हर लेते हैं और हवन करते समय बोलने वाले की श्री को अग्निदेव हरण कर लेते हैं – स्नातश्च वरुणो तेजो जुह्वतोsग्नि: श्रियं हरेत्।

मौन रहना एक तप है, एक साधना है…

‘मुनेर्भावो मौनम्’ अर्थात् मुनि का भाव ही मौन है. मौनी (न्) शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए लिखा है कि मौनमस्यास्तीति. अर्थात् जिसमें मौन हो वह मौनी (मुनि )है, परंतु हर मौन रहने वाला व्यक्ति मुनि नहीं होता है. श्रेष्ठ मुनि के लिए मौन रहने के साथ-साथ आत्म तत्व को जानना भी आवश्यक है.

महाभारत उद्योग पर्व में कहा गया है – मौनान्न स मुनिर्भवति नारण्यवसनान्मुनि:। स्वलक्षणं तु यो वेद स मुनि: श्रेष्ठ उच्यते। अर्थात् मौन रहने अथवा जंगल में निवास करने मात्र से कोई मुनि नहीं होता. जो अपने आत्मा के स्वरूप को जानता है, वहीं श्रेष्ठ मुनि कहलाता है.

इस प्रकार मौन रहने से मुनि संबंधी अनेक गुण मनुष्य में स्वतः आ जाते हैं. वाणी-विषयक मन के संयम का नाम मौन है. मौन व्रत व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है. मौन स्वयं से संवाद करने का साधन है. यह हमें आत्मावलोकन और आत्मविश्लेषण का अवसर प्रदान करता है. यह आंतरिक शक्तियों का संरक्षण, मन का निग्रह और दुर्वृत्तियों का शमन करता है. मन को शुद्धन करने के लिए मानसिक तप आवश्यक होता है और मानसिक तप का प्रधान अंग मौन व्रत है. मौन के अप्रतिम महत्व को देखते हुए हमारे शास्त्रों में छह कार्यों के समय मौन का विधान किया गया है –
उच्चारे मैथुने चैव प्रस्रावे दन्तधावने ।
स्नाने भोजनकाले च षट्सु मौनं समाचरेत् ॥
अर्थात्- जप, मैथुन, मल-मूत्र-विसर्जन के समय, दंतधावन के समय, स्नान के समय और भोजन के समय मौन रहना चाहिए. इन अवसरों पर मौन का वैज्ञानिक महत्व भी सिद्ध है. शास्त्र कहते हैं कि यदि मौनी अमावस्या के दिन सोमवार हो और उस दिन व्यक्ति मौन रहकर हरि -चिंतन करे तो उसे एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है. इसमें अर्थवाद भले हो, किंतु यह मौन के अतिशय महत्व और उस पर बल देना प्रदर्शित करता है. मौन से व्यक्ति का चित्त एकाग्र होता है. एकाग्र मन से ही धर्म का धारण और ध्यान किया जाता है –
धारणान्मनसा ध्यानाद् यं धर्मकवयो विदुः। (महाभारत)

बिना तन्मयतापूर्वक ध्यान करने से परमेश्वर प्रकाश में नहीं आते हैं-
स तन्मयत्वेन विभाति राजन्। (महाभारत)
महाभारत उद्योगपर्व में सनत्सुजात धृतराष्ट्र से कहते हैं – राजन! जहां मन के सहित वाणी रूप वेद नहीं पहुंच पाते, उस परमात्मा का ही नाम मौन है. यहां परमात्मा को मौन स्वरूप बताया गया है –
यतो न वेदा मनसा सहैन –
मनुप्रविश्यन्ति ततोsत्थमौनम्।

एक साथ नहीं रहते मान और मौन

इसी पर्व में एक उल्लेखनीय बात कही गयी है कि मान और मौन सदा एक साथ नहीं रहते, क्योंकि मान से इस लोक में सुख मिलता है और मौन से परलोक में.

मौन दो प्रकार का होता है- वाणी से और मन से. कम बोलना और सत्य बोलना- यह भी मौन का एक प्रकार है. दूसरा मन से मौन रहकर. मौन के समय मन में सद् और शुभ चिंतन ही करना चाहिए. अशुभ और दुष्ट चिंतन से मौन का उद्देश्य नष्ट हो जाता है. कभी-कभी वाणी और विचारों- दोनों से व्यक्ति को मौन धारण करना चाहिए. यह ध्यान से संभव होता है.

मौन के हैं अनेक लाभ

सांसारिक जीवन में भी मौन के अनेक लाभ हैं. ‘मौनेन कलहो नास्ति’- अर्थात् मौन से कलह नहीं होता. मौन से आपकी आंतरिक ऊर्जा का सरंक्षण होता है. मौन से आप अनावश्यक विवाद में नहीं पड़ते हैं. हमारे ग्रंथों में मौन के अनेक गुण बताये गये हैं- जैसे पर -निंदा से बचे रहेंगे, असत्य भाषण से बचेगे, अंत: करण की शांति भंग नहीं होगी, किसी से क्षमा नहीं मांगनी पड़ेगी, आदि-आदि. जब आप मौन रहते हैं, तब आपको अपनी कमियों के विश्लेषण का अवसर मिलता है, परमात्मा के चिंतन, मनन का अवसर मिलता है.

रघुवंश महाकाव्य में कविकुल गुरु कालिदास राजा दिलीप के अनेक सद्गुणों का वर्णन करते हुए सर्वप्रथम उनके मौन गुण का उल्लेख करते हैं –
ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्यय:।
अर्थात्- दूसरे की बात जानकर भी (दूसरे के गुप्त रहस्यों को जानकर भी) मौन रहना, यह राजा दिलीप का प्रथम गुण था.

इससे व्यक्ति के धैर्य और गांभीर्य का पता लगता है. परदोष दर्शन को हमारे शास्त्रों में गर्हित बताया गया है. मौन में अपरिमित शक्ति होती है, मौन से व्यक्ति का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य उत्तम रहता है. व्यक्ति में रचनात्मकता और सकारात्मकता बढ़ती है.
आधुनिक कवि भी मौन के महिमा प्रख्यापन में सदैव मुखर रहे हैं. मौन को सर्वार्थ साधक बताते हुए लिखा है –आत्मन: गुण दोषेण बध्यते शुक सारिका।
बका: तत्र न बध्यते मौनं सर्वार्थसाधनम्।।

अर्थात्- वाचाल होने के अपने गुण-दोष के कारण तोता-मैना पिंजरे में कैद हो जाते हैं, किंतु बगुला मौन रहने के कारण स्वच्छंद रहता है. मौन रहने से सब कुछ साधा जा सकता है.
विद्वानों की सभा में मूर्खों के लिए मौन किसी आभूषण से कम नहीं होता.
विशेषतः सर्वविदां समाजे
विभूषणं मौनमपण्डितानाम्।।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण का मौन के महत्व के संबंध मेंअधोलिखित वचन उल्लेखनीय हैं –
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते । 17/6

यहां मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मौन (मननशीलता) मन का निग्रह और भावों की शुद्धि को मानसिक तप कहा गया है. मानसिक तप के बिना मनुष्य इहलोक और परलोक दोनों में अभीष्ट नहीं प्राप्त कर सकता. मानसिक व्रत के बिना शारीरिक तप का कोई मूल्य नहीं.

मौनव्रत का अभ्यास शनैःशनैः करना चाहिए. पहले कुछ घंटे, फिर एक दिन, दो दिन, तीन दिन.
मौनी अमावस्या के दिन यदि कोई दिनभर मौन न रह सके तो कम से कम सूर्योदय से लेकर स्नान के समय तक मौन रहने का प्रयास करना चाहिए. तिथ्यादितत्त्व कहता है कि एतच्च मौनमरुणोदयमारभ्य स्नानपर्यन्तं कार्यं न तु स्नानकालमात्रे।

मौन के दौरान ईश्वर विषयक चिंतन-मनन करते हुए अपने अंदर सद्गुणों के विकास का प्रयास करना चाहिए. संक्षेप में कहा जा सकता है कि मौन रह कर पवित्र नदियों में स्नान करने से और विशेष रूप से मौनी अमावस्या को त्रिवेणी संगम में स्नान करने से आध्यात्मिक विकास, मानसिक शांति और ऐहिक अभ्युदय होता है. इससे व्यक्ति के मानसिक विकार दूर होते हैं और उसमें सकारात्मक ऊर्जा का संचय होता है.

पवित्र नदियां : देवीस्वरूपा और ऊर्जा केंद्र

वैसे पवित्र नदियों या नदियों के संगम में स्नान और दान की शास्त्रों में अनेकशः महिमा वर्णित है, क्योंकि वेदों और पुराणों में पवित्र नदियों को देवीस्वरूपा (देवितमे) कहा गया है. पवित्र नदियों के संगम स्थल को ऋग्वेद में तप, ध्यान और चिंतन के लिए श्रेष्ठ कहा गया है. ऐसे स्थलों पर मेधा और प्रज्ञा प्रखर होती है. ऐसे स्थान अपरिमित ऊर्जा से से ऊर्जित रहते हैं. यहां स्नान और ध्यान सद्य: फलदायी होता है.
उपह्वरे गिरीणां संगमे च नदीनाम् धियो विप्रो अजायत। (ऋग्वेद 8/28, यजुर्वेद 26/15)

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लेखक के बारे में

By Shaurya Punj

मैंने डिजिटल मीडिया में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव हासिल किया है. पिछले 6 वर्षों से मैं विशेष रूप से धर्म और ज्योतिष विषयों पर सक्रिय रूप से लेखन कर रहा हूं. ये मेरे प्रमुख विषय हैं और इन्हीं पर किया गया काम मेरी पहचान बन चुका है. हस्तरेखा शास्त्र, राशियों के स्वभाव और उनके गुणों से जुड़ी सामग्री तैयार करने में मेरी निरंतर भागीदारी रही है. रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद. इसके साथ साथ कंटेंट राइटिंग और मीडिया से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए मेरी मजबूत पकड़ बनी. इसके अलावा, एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और शिक्षा जैसे विषयों पर भी मैंने गहराई से लेखन किया है, जिससे मेरी लेखन शैली संतुलित, भरोसेमंद और पाठक-केंद्रित बनी है.

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