Mahabharata Secret: महाभारत के सभी पात्रों में भगवान श्रीकृष्ण का अपने प्रिय सखा अर्जुन के प्रति विशेष स्नेह था. जब महाभारत युद्ध की परिस्थितियां बनने लगीं, तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन का सारथी बनने की इच्छा व्यक्त की. अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा कि जब भगवान स्वयं इतने महान हैं, तो वे सारथी जैसा कार्य क्यों करना चाहते हैं. इस पर श्रीकृष्ण मुस्कुराए और कहा कि समय आने पर इसका उत्तर स्वयं स्पष्ट हो जाएगा.
नारायणी सेना और श्रीकृष्ण में से किसे चुना अर्जुन ने?
महाभारत युद्ध से पहले कौरव और पांडव अपने-अपने पक्ष को मजबूत करने में जुटे थे. इसी दौरान अर्जुन और दुर्योधन दोनों श्रीकृष्ण के पास सहायता मांगने पहुंचे. भगवान ने दोनों के सामने विकल्प रखा कि एक ओर उनकी विशाल नारायणी सेना होगी और दूसरी ओर वे स्वयं रहेंगे, लेकिन युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएंगे. पहले चयन का अवसर अर्जुन को मिला और उन्होंने बिना किसी संकोच के श्रीकृष्ण को चुना. वहीं दुर्योधन नारायणी सेना पाकर बेहद प्रसन्न हुआ. उसे लगा कि निहत्थे कृष्ण की तुलना में सेना अधिक उपयोगी सिद्ध होगी.
गीता का उपदेश देकर दूर किया अर्जुन का मोह
युद्ध शुरू होने पर श्रीकृष्ण ने सारथी का दायित्व संभाला. जब अर्जुन ने युद्धभूमि में अपने गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म और अन्य संबंधियों को सामने देखा, तो उनका मन विचलित हो गया. उन्होंने गांडीव नीचे रख दिया और युद्ध करने से इनकार कर दिया. तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्म, धर्म और जीवन के गहन रहस्यों का ज्ञान देते हुए श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया. इसी दिव्य ज्ञान ने अर्जुन का मोह दूर किया और उन्हें धर्मयुद्ध के लिए तैयार किया.
कर्ण के प्रहार पर श्रीकृष्ण क्यों करते थे प्रशंसा?
महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण और अर्जुन के बीच कई बार भयंकर संघर्ष हुआ. एक अवसर पर कर्ण के बाणों से अर्जुन का रथ पीछे की ओर खिसक गया. तब श्रीकृष्ण ने कर्ण के पराक्रम की प्रशंसा की. यह सुनकर अर्जुन को आश्चर्य हुआ. श्रीकृष्ण ने बताया कि जिस रथ पर स्वयं वे और ध्वज पर हनुमानजी विराजमान हों, उसे पीछे धकेलना साधारण बात नहीं है. इसलिए कर्ण की वीरता प्रशंसा के योग्य थी.
18वें दिन सामने आया सारथी बनने का असली रहस्य
महाभारत युद्ध के अंतिम दिन एक चमत्कारी घटना घटी. युद्ध समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पहले रथ से उतरने के लिए कहा. जैसे ही अर्जुन नीचे उतरे और उसके बाद श्रीकृष्ण रथ से उतरे, उसी क्षण रथ में आग लग गई और वह जलकर राख हो गया.
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श्रीकृष्ण की उपस्थिति से सुरक्षित था अर्जुन का रथ
अर्जुन इस घटना को देखकर हैरान रह गए. तब श्रीकृष्ण ने बताया कि भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण और अन्य महारथियों के दिव्य अस्त्रों से यह रथ युद्ध के दौरान ही नष्ट हो चुका था. केवल उनकी दिव्य उपस्थिति के कारण वह सुरक्षित दिखाई दे रहा था. जैसे ही वे रथ से उतरे, उन अस्त्रों का प्रभाव प्रकट हो गया और रथ भस्म हो गया.
सारथी नहीं, अर्जुन के रक्षक थे श्रीकृष्ण
महाभारत की यह घटना बताती है कि श्रीकृष्ण केवल अर्जुन के सारथी नहीं थे, बल्कि उनके मार्गदर्शक, रक्षक और जीवन के सबसे बड़े शुभचिंतक भी थे. उन्होंने हर संकट में अर्जुन का साथ दिया और यह संदेश दिया कि जब जीवन की लगाम ईश्वर के हाथों में होती है, तब सबसे कठिन युद्ध भी जीते जा सकते हैं.
