डॉ राकेश कुमार सिन्हा ‘रवि’
Budhwa Mangal Holi 2026: भारतीय इतिहास में राजदरबारों में विदूषकों का खास स्थान रहा है. वे केवल हंसाने के लिए नहीं होते थे, बल्कि अपनी बुद्धि, चतुराई और व्यंग्य से राजा को सही सलाह भी देते थे. मुगल सम्राट अकबर के दरबार में बीरबल, विजयनगर के राजा राजा कृष्ण देव राय के दरबार में तेनाली रामन, और बंगाल के राजा कृष्ण चंद्र राय के दरबार में गोपाल भांड जैसे विदूषक बहुत प्रसिद्ध थे. इसी परंपरा में 19वीं सदी के आसपास मगध (बिहार) के टिकारी राज दरबार में पंडित देवन मिसिर का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है. वे नौ रत्नों में शामिल थे और अपनी हाजिरजवाबी के कारण बहुत प्रसिद्ध थे.
पंडित देवन मिसिर का व्यक्तित्व
पंडित देवन मिसिर टिकारी राज की महारानी इंद्रजीत कुवंर के प्रधान सलाहकार थे. वे बुद्धिमान, दूरदर्शी और बेहद चतुर थे. उनकी बातें इतनी प्रभावशाली होती थीं कि दरबार में उनका विशेष सम्मान था. आज भी मगध क्षेत्र में उनकी कहानियां लोककथाओं के रूप में सुनाई जाती हैं. लोग उन्हें केवल विदूषक नहीं, बल्कि एक समझदार और हास्य-व्यंग्य के माध्यम से सच्चाई कहने वाले व्यक्ति के रूप में याद करते हैं.
होली से दूरी की अनोखी आदत
जनश्रुतियों के अनुसार, पंडित देवन मिसिर होली के दिन रंग खेलने से बचते थे. जब पूरा राजदरबार रंग-गुलाल में सराबोर होता था, तब वे अपने घर में रहकर पूजा-पाठ और साधना करते थे. कुछ लोगों का मानना था कि वे इस दिन विशेष यज्ञ भी करते थे. उनके मित्र और परिचित उन्हें रंग लगाने की कोशिश करते, लेकिन वे हर बार किसी न किसी बहाने से बच निकलते. उनकी चतुराई के कारण कोई उन पर ज्यादा जोर भी नहीं डालता था.
महारानी का विशेष निमंत्रण
एक वर्ष यह बात महारानी इंद्रजीत कुवंर तक पहुंची कि उनके प्रिय सलाहकार हर बार होली से दूर रहते हैं. इस बार उन्होंने पंडित जी को विशेष निमंत्रण भेजा. लेकिन होली के दिन पंडित जी दरबार नहीं पहुंचे. महारानी ने उनकी खबर लेने के लिए अपने सेवक हरे राम को उनके गांव आंती भेजा. उस समय यात्रा के साधन कम थे, इसलिए सेवक रात में ही उनके घर पहुंच पाया. पंडित जी ने बहाना बनाया कि उन्हें पिछले रात से दस्त हो रहे हैं और वे दरबार नहीं आ सकते. उन्होंने इतनी गंभीरता से बात कही कि सेवक को भी विश्वास हो गया. रात हो जाने के कारण सेवक को वहीं रुकना पड़ा. पंडित जी ने उसका खूब आदर-सत्कार किया. स्वादिष्ट भोजन और ठंडई पीने के बाद सेवक गहरी नींद में सो गया और अगले दिन दोपहर तक नहीं उठा.
रानी का गांव आना और चतुर योजना
जब अगले दिन न पंडित जी पहुंचे और न सेवक लौटा, तो महारानी चिंतित हो गईं. उन्होंने स्वयं गांव जाने का निर्णय लिया. जैसे ही यह खबर पंडित जी तक पहुंची, उन्होंने तुरंत योजना बना ली. उन्होंने पूरे गांव में रंगों से भरे बड़े-बड़े ड्रम रखवा दिए, ताकि रानी और उनके साथ आने वाले लोगों का रंगों से स्वागत किया जा सके. संयोग से होली का दूसरा दिन मंगलवार था. पंडित जी खुद भी रंगों में इस तरह रंग गए कि उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया. जब रानी अपने दल के साथ पहुंचीं, तो गांव में जमकर रंग खेला गया. पानी के फव्वारे चले, अबीर-गुलाल उड़ा और पूरा माहौल उत्सवमय हो गया.
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‘बुढ़वा मंगल’ की परंपरा
इसी घटना के बाद टिकारी राज में होली के दूसरे दिन विशेष उत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई, जिसे “बुढ़वा मंगल” कहा जाता है. इस दिन मटका फोड़ने जैसे कार्यक्रम भी होते हैं. मगध क्षेत्र में अन्य स्थानों की तुलना में एक दिन ज्यादा होली मनाने की परंपरा उसी समय से चली आ रही है. इस दिन रात में महफिल सजती है, लोकगीत गाए जाते हैं और फगुआ से चैतार का शुभारंभ होता है. आज भी मगध के गांवों में बुढ़वा मंगल बड़े उत्साह से मनाया जाता है. इस परंपरा का श्रेय पंडित देवन मिसिर की चतुराई और बुद्धिमत्ता को दिया जाता है. यही कारण है कि मगध की होली के गीतों में आज भी उनका नाम सम्मान से लिया जाता है.
