परमात्मा की सत्ता नित्य है, ब्रह्म नित्य है, निराकार है. नित्य किसको कहते हैं? जो सदा रहे, ऐसे को ही परमात्मा कहा. अब परमात्मा का आकार कैसा है? औरत है? आदमी है? जानवर है? बच्चा है? वृक्ष है? पहाड़ है? क्या आकार है, उसका? वह निराकार है. उस नित्य, परमब्रह्म सर्वरूप में विराजमान ब्रह्म का अनुभव कैसे होता है? वह गुरु से होता है.
गुरु ही करायेगा, यह तो समझ लग गयी, पर फिर भी कैसे होता है? इसका सिस्टम क्या है? इसकी विधि क्या है? कहा गया कि- ‘दीपो दीपांतरम् यथा’ एक जलता हुआ दीपक और उस जलते हुए दीपक के पास आप एक अनजले हुए दीपक को रख दो, उसे इतना पास रख दो कि दीये से दीया मिल रहा है और बाती से अनजली बाती मिलने लग जाये, तो वह जली हुई जोत ऊछल कर उस अनजली बाती पर पहुंच जाये. जैसे जली हुई ज्योति उस अनजले पर छलांग मार कर पहुंच जाती है, ठीक ऐसे की गुरु का ब्रह्म-अनुभव शिष्य के पास पहुंच जाता है.
इसीलिए गुरु के सान्निध्य में रहें. जैसे जला हुआ दीपक यहां है और अनजला हुआ दीपक वहां दो हजार मील दूर है, तो क्या वह जल जायेगा? अच्छा और नजदीक कर देती हूं, एक किलोमीटर, तो क्या जल जायेगा? कितना नजदीक होना चाहिए? एक हाथ दूरी पर जलेगा? नहीं जलेगा. अनजला दीपक, जले हुए दीपक के बिल्कुल समीप हो, तो जल जाता है. इसीलिए गुरु के सान्निध्य में रहें. गुरु के सान्निध्य में रहने पर वह बोध ट्रांसफर हो जाता है. जो सोचते हैं कि गुरु के बताये, सुनाये शब्दों से हमें परमात्मा मिल जायेगा, तो वे बहुत बड़ी गलती में हैं. इस रहस्य को समझो.
परमात्मानुभूति के लिए गुरु के सान्निध्य में रहें. यह सान्निध्य केवल शरीर का ही नहीं, यह सान्निध्य मन का, हृदय का भी होना चाहिए. आप गुरु के सान्निध्य में नहीं हो, यह आपका दोष हो सकता है, पर यह न कहो कि यहां कुछ नहीं, क्योंकि यहां जो है, वह देखने को आंख चाहिए. गुरु के सान्निध्य में रहें, शरीर से मन से, भाव से, हृदय से. हर अच्छा गुरु एक अच्छे शिष्य की तलाश करता है. कौन सा शिष्य? जिसको वह अपना बोध ट्रांसफर कर सके. यह बात बहुत गहरी है, इसे होश से समझना होगा.
आनंदमूर्ति गुरु मां
