हमारा जीवन ईश्वर का अद्भुत वरदान है. परमात्मा ने हमें इतना सुंदर शरीर दिया है. इस संसार को देखने के लिए आंख दी. प्रकृति के संगीत सुनने के लिए कान दिये. प्रकृति ने अपनी गोद में भिन्न-भिन्न प्रकार के मनोरम फूल खिलाये. कल-कल करते झरने बनाये. पहाड़ रेगिस्तान, नदियां, वनस्पति, चांद, तारे, नक्षत्र, ग्रहमंडल एक साथ तमाम सौंदर्य से भरे दृश्यों को इस मनुष्य जाति के उपयोग के लिए निर्मित किये. इतना सब कुछ प्रकृति ने इसलिए दिया कि मनुष्य अपने शरीर को स्वस्थ एवं सुरक्षित रखते हुए सद्कर्म की ओर प्रेरित होता रहे.
जिन लोगों ने इस जीवन को आनंद रूप में स्वीकार किया, उनका जीवन धन्य हो गया. दूसरी ओर, ऐसे भी लोग हुए, जिन्होंने जीवन को नर आदि कह कर उसे हमेशा प्रताड़ित किया. दरअसल, जीवन के दो पक्ष होते हैं. एक वे लोग हैं, जो जीवन को आनंद रूप में लेते हैं और दूसरे जीवन के काला पक्ष को ही देखते हैं. यह हमारे ऊपर है कि हम जीवन को किस रूप में लेते हैं. परमात्मा ने इस जीवन को अमृतमय बनाने का भरपूर प्रयास किया है. हमें सौ वर्ष तक जीने का आशीर्वाद परमात्मा ने दिया है. अगर उससे कम हम जीते हैं, तो निश्चित रूप से हमारे जीवन जीने की विधि में कोई भूल हो रही है. स्वस्थ रहना शरीर का अपना धर्म है. अस्वस्थ होने का अर्थ है कि हमसे कोई गलती हो गयी है. फिर, जब हम गलती को सुधार लेते हैं, तो स्वस्थ हो जाते हैं.
अगर शुरू से इस बात का निश्चय कर लें कि हमें स्वस्थ रहना है, तो अस्वस्थ होने का कोई सवाल नहीं. हमारा जीवन पूरी तरह नियमों से बंधा हुआ है. नियम के प्रतिकूल आचरण करने पर हमारा शरीर अस्वस्थ हो जाता है. प्रकृति ने हमारे शरीर को पांच तत्वों से निर्मित किया है.
पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश- ये पांच तत्व ही परमात्मा हैं. ये पांच तत्व जब सम्यक रूप से काम करते हैं, तो शरीर में कभी कोई विकार नहीं हो सकता. लेकिन, जब हम अपने शरीर से इन तत्वों को स्वयं सम्यक होने में विघ्न पैदा कर देते हैं, तो शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है. हमारा जीवन आज इतना बनावटी और नकली होता जा रहा है कि इस शरीर काे स्वस्थ रखना अब मुश्किल हो
गया है.
– आचार्य सुदर्शन
