ज्योतिष के नाम पर सौ में से निन्यानबे धोखाधड़ी है. और वह जो सौवां आदमी है, निन्यानबे को छोड़ कर, उसे समझना बहुत मुश्किल है. मेरा प्रयोजन है कि मैं उस पूरे-पूरे विज्ञान को आपको बहुत तरफ से उसके दर्शन करा दूं. कुछ आपके जीवन में अनिवार्य है. और वह आपके जीवन में और जगत के जीवन में संयुक्त और लयबद्ध है. उसमें पूरा जगत भागीदार है.
अस्तित्व में सब क्रिसक्राॅस बिंदु हैं, जहां जगत की अनंत शक्तियां आकर एक बिंदु को काटती हैं, वहां व्यक्ति निर्मित हो जाता है. वह जो सारभूत ज्योतिष है, उसका अर्थ केवल इतना ही है कि हम अलग नहीं हैं. एक, उस एक ब्रह्म के साथ हैं, उस एक ब्रह्मांड के साथ हैं और प्रत्येक घटना भागीदार है.
जब एक बच्चा पैदा हो रहा है, तो पृथ्वी के चारों तरफ क्षितिज को घेर कर खड़े हुए जो भी नक्षत्र हैं, ग्रह हैं, उपग्रह हैं, महातारे हैं- वे सब उस एक्सपोजर के क्षण में बच्चे के चित्त पर गहराइयों तक प्रवेश कर जाते हैं. फिर उसकी कमजोरियां, उसकी ताकतें, उसका क्षमता, सब सदा के लिए प्रभावित हो जाता है. जन्म के समय, बच्चे के मन की दशा फोटो प्लेट जैसी बहुत ही संवेदनशील होती है. जब बच्चा गर्भ में आता है, यह पहला एक्सपोजर है. जब बच्चा पैदा होता है, वह दूसरा एक्सपोजर है. ये दो एक्सपोजर बच्चे के संवेदनशील मन पर फिल्म की तरह छप जाते हैं.
उस समय में जैसी दुनिया है, वैसी की वैसी बच्चे पर छप जाती है. यह बच्चे के सारे जीवन की सहानुभूति और विद्वेष को तय करता है. ज्योतिष के तीन हिस्से हैं. एक- जिसे हम कहें ‘अनिवार्य’, जिसमें रत्ती भर फर्क नहीं होता. वही सर्वाधिक कठिन है, उसे जानना. फिर उसके बाहर की परिधि है- ‘अनिवार्य नहीं’, जिसमें सब परिवर्तन हो सकते हैं. मगर हम उसी को जानने को उत्सुक होते हैं.
और उन दोनों के बीच में एक परिधि है- ‘अर्ध-अनिवार्य’, जिसमें जानने से परिवर्तन हो सकते हैं, न जानने से कभी परिवर्तन नहीं होंगे. इसके तीन हिस्से कर लें. अनिवार्य, जो बिलकुल गहरा है, जिसमें कोई अंतर नहीं हो सकता. उसे जानने के बाद उसके साथ सहयोग करने के सिवाय कोई उपाय नहीं है. इनको जानना सारभूत ज्योतिष को जानना है.
– आचार्य रजनीश ओशो
